कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९ बालकाण्ड धनुर्यज्ञ छोनीमेंके छोनीपति छाजैं जिन्हें छत्रछाया छोनी-छोनी छाए छिति आए निमिराजके । प्रबल प्रचंड बरिबंड बर वेष बपु बरिबेकों बोले बैदेही वर काजके ॥ बोले बंदी बिरुद बजाइ बर बाजनेऊ बाजे-बाजे बीर बाहु धुनत समाजके। तुलसी मुदित मन पुर नर-नारि जेते बार-बार हेरैं मुख औध-मृगराजके ॥ ८॥ जिनके ऊपर राजछत्रोंकी छाया शोभायमान है ऐसे पृथ्वीभरके परन्तु उन सबको देख और विचारकर भी उसकी बुद्धि कुण्ठित हो गयी । अर्थात् उसे उस शोभाके योग्य कोई भी उपमा नहीं मिली। काशी-नागरी-प्रचारिणी सभाकी प्रतिमें यों अर्थ है - दस गुण माधुर्यके ( रूप, लावण्य, सौन्दर्य, माधुर्य, सौकुमार्य, यौवन, सुगन्ध, सुवेष, स्वच्छता, उज्ज्वलता ) चार गुण प्रतापके ( ऐश्वर्य, वीर्य, तेज, बल ) । ऐश्वर्यके नौ गुण ( भाग्य, अदभ्रता, नियतात्मता, वशीकरण, वाग्मित्व, सर्वज्ञता, संहनन, स्थिरता, वदान्यता ) । सहज या प्रकृतिके तीन गुण ( सौम्यता, रमण, व्यापकता ) । यशके इक्कीस गुण ( सुशीलता, वात्सल्य, सुलभता, गम्भीरता, क्षमा, दया, करुणा, आर्द्रता, उदारता, आर्जव, शरण्यत्व, सौहार्द, चातुर्य, प्रीतिपालकत्व, कृतज्ञता, ज्ञान, नीति, लोकप्रियता, कुलीनता, अनुराग, निर्वहणता ) ।