कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ८ पद कंजनि मंजु बनीं पनहीं, धनुहीं सर पंकज-पानि लिएँ। लरिका सँग खेलत डोलत हैं सरजू-तट चौहट हाट हिएँ॥ तुलसी अस बालक सों नहि नेहु कहा जप जोग समाधि किएँ। नर वे खर सूकर स्वान समान कहौ जगमें फलु कौन जिएँ ॥६॥ उनके चरणकमलोंमें मनोहर जूतियाँ सुशोभित हैं, वे करकमलोंमें छोटा-सा धनुष-बाण लिये हुए हैं, बालकोंके साथ सरयूजीके किनारे, चौराहे और बाजारोंमें खेलते फिरते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—यदि ऐसे बालकोंसे प्रेम न हुआ तो बताइये जप, योग अथवा समाधि करनेसे क्या लाभ है? वे लोग तो गधों, शूकरों और कुत्तोंके समान हैं, बताइये संसारमें उनके जीनेका क्या फल है ? सरजू बर तीरहिं तीर फिरैं रघुबीर सखा अरु बीर सबै। धनुहीं कर तीर, निषंग कसें कटि पीत दुकूल नवीन फबै॥ तुलसी तेहि औसर लावनिता दस चारि नौ तीन इक्कीस सबै। मति भारति पंगु भई जो निहारि बिचारि फिरी उपमा न पवै ॥७॥ श्रीरघुनाथजी, उनके सखा और सब भाई पवित्र सरयू नदीके किनारे-किनारे घूमते फिरते हैं। उनके हाथमें छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं, कमरमें तरकस कसा हुआ है और शरीरपर नूतन पीताम्बर सुशोभित है। तुलसीदासजी कहते हैं—श्रीशारदाकी मति उस समयकी सुन्दरताकी उपमा चौदहों भुवन, नवों खण्ड, तीनों लोक और इक्कीसों ब्रह्माण्डोंमें जब विचारपूर्वक खोजनेपर भी नहीं पा सकी तब कुण्ठित हो गयी*।
- उस समय शोभाकी उपमा पानेके लिये शारदा दसों यामल-तन्त्र, चारों उपवेद, नवों व्याकरण, वेदत्रयी और इक्कीसों ब्रह्माण्डोंमें सर्वत्र फिरीं,