भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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किलक-किलककर मनोहर बाललीलाएँ करते हैं। अयोध्यापति महाराज दशरथके वे चारों बालक तुलसीदासके मनमन्दिरमें सदैव विहार करें। बाललीला कबहूँ ससि मागत आरि करैं कबहूँ प्रतिबिंब निहारि डरैं। कबहूँ करताल बजाइकें नाचत मातु सबै मन मोद भरैं ॥ कबहूँ रिसिआइ कहैं हठिकै पुनि लेत सोई जेहि लागि अरैं। अवधेसके बालक चारि सदा तुलसी-मन-मंदिरमें बिहरैं ॥४॥ कभी चन्द्रमाको माँगनेका हठ करते हैं, कभी अपनी परछाईं देखकर डरते हैं, कभी हाथसे ताली बजा-बजाकर नाचते हैं जिससे सब माताओंके हृदय आनन्दसे भर जाते हैं। कभी रूठकर हठपूर्वक कुछ कहते ( माँगते ) हैं और जिस वस्तुके लिये अड़ते हैं उसे लेकर ही मानते हैं। अयोध्यापति महाराज दशरथके वे चारों बालक तुलसीदासके मन-मन्दिरमें सदैव विहार करें। बर दंतकी पंगति कुंदकली अधराधर-पल्लव खोलनकी। चपला चमकै घन बीच जगै छबि मोतिन माल अमोलनकी ॥ घुँघुरारि लटैं लटकैं मुख ऊपर कुंडल लोल कपोलनकी। नेवछावरि प्रान करै तुलसी बलि जाउँ लला इन बोलनकी ॥५॥ कुन्दकलीके समान उज्ज्वलवर्ण दन्तावली, अधरपुटोंका खोलना और अमूल्य मुक्तामालाओंकी छवि ऐसी जान पड़ती है मानो श्याममेघके भीतर बिजली चमकती हो। मुखपर घुँघुराली अलकें लटक रही हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—लल्ला ! मैं कुण्डलोंकी झलकसे सुशोभित तुम्हारे कपोलों और इन अमोल बोलोंपर अपने प्राण न्यौछावर करता हूँ।