भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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कवितावली ६ मोहित न हों उन्हें धिक्कार है । उस बालकके अञ्जन-रञ्जित मनोहर नेत्र खञ्जन पक्षीके बच्चेके समान थे । हे सखि ! वे ऐसे जान पड़ते थे मानो चन्द्रमाके भीतर दो समान रूपवाले नवीन नील- कमल खिले हुए हों । पग नूपुर औ पहुँची करकंजनि मंजु बनी मनिमाल हिएँ । नवनील कलेवर पीत झँगा झलकै पुलकैं नृपु गोद लिएँ ॥ अरबिंदु सो आननु रूप मरंदु अनंदित लोचन-भृंग पिएँ । मनमो न बस्यौ अस बालकु जौं तुलसी जगमें फलु कौन जिएँ ॥२॥ उस बालकके चरणोंमें घुँघुरू, करकमलोंमें पहुँची और गलेमें मनोहर मणियोंकी माला शोभायमान थी । उसके नवीन श्याम शरीरपर पीला झँगुला झलकता था । महाराज उसे गोदमें लेकर पुलकित हो रहे थे । उसका मुख कमलके समान था, जिसके रूप- मकरन्दका पानकर [ देखनेवालोंके ] नेत्ररूप भौंरे आनन्दमग्न हो जाते थे । श्रीगोसाईंजी कहते हैं—यदि मनमें ऐसा बालक न बसा तो संसारमें जीवित रहनेसे क्या लाभ है ? तनकी दुति स्याम सरोरुह लोचन कंजकी मंजुलताई हरैं । अति सुंदर सोहत धूरि भरे छबि भूरि अनंगकी दूरि धरैं ॥ दमकैं दँतियाँ दुति दामिनि ज्यौं किलक कल बालबिनोद करैं । अवधेसके बालक चारि सदा तुलसी-मन-मंदिरमें बिहरैं ॥३॥ उनके शरीरकी आभा नीलकमलके समान है तथा नेत्र कमल- की शोभाको हरते हैं । धूलिसे भरे होनेपर भी वे बड़े सुन्दर जान पड़ते हैं और कामदेवकी महती छबिको भी दूर कर देते हैं । उनके नन्हे-नन्हे दाँत बिजलीकी चमकके समान चमकते हैं और वे