कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 151, कुल 228 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १४८ भिक्षा माँगनेवाले (ब्राह्मण) कुलमें तो उत्पन्न हुआ, जिसके उपलक्षमें बधावा बजाया गया । यह सुनकर माता-पिताको परिताप और कष्ट हुआ । फिर बालपनसे ही अत्यन्त दीन होनेके कारण द्वार-द्वार ललचाता और बिलबिलाता फिरा, चनेके चार दानोंको ही अर्थ, धर्म, काम और मोक्षरूप चार फल समझता था । वही तुलसी अब समर्थ स्वामी श्रीरामचन्द्रजीका सुसेवक है—यह सुनकर ब्रह्मा-जैसे गणक (ज्योतिषी) को भी चिन्ता और ईर्ष्या होती है । हे राम ! मालूम नहीं, आपका नाम चतुर है या पागल जो तृणसे भी तुच्छ पुरुषको पर्वतसे भी भारी बना देता है। वेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत, रामनाम ही सों रीझें सकल भलाई है । कासीहूँ मरत उपदेसत महेसु सोई, साधना अनेक चितई न चित लाई हैं ॥ छाछीको ललात जे, ते रामनामकें प्रसाद, खात खुनसात सोंधे दूधकी मलाई है। रामराज सुनिअत राजनीतिकी अवधि, नामु राम ! रावरो तौ चामकी चलाई है ॥७४॥ वेद-पुराण भी कहते हैं और लोकमें भी देखा जाता है कि रामनामहीसे प्रेम करनेमें सब तरहकी भलाई है । काशीमें मरनेपर महादेवजी भी जीवोंको उसीका उपदेश करते हैं। उन्होंने अनेकों साधनोंकी ओर न दृष्टि दी है और न उन्हें चित्तहीमें स्थान दिया है । जो छाछको ललचाते थे वे रामनामके प्रसादसे सुगन्धित दूधकी मलाई खानेमें भी नाक-भौ सिकोड़ते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके