भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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१४९ उत्तरकाण्ड राज्यमें राजनीतिकी पराकाष्ठा सुनी जाती है; किन्तु हे रामजी ! आपके नामने तो चमड़ेका सिक्का चला दिया ( अर्थात् अधमोंको भी उत्तम बना दिया ) । सोच-संकटनि सोचु संकटु परत, जर जरत, प्रभाउ नाम ललित ललामको। बूड़िऔ तरति, बिगरीऔ सुधरति बात, होत देखि दाहिनो सुभाउ बिधि बामको ॥ भागत अभागु, अनुरागत बिरागु, भागु, जागत आलसि तुलसीहू-से निकामको। भाई धारि फिरि कै गोहारि हितकारी होति, आई मीचु मिटति जपत रामनामको ॥७५॥ अति सुन्दर और श्रेष्ठ रामनामका ऐसा प्रभाव है कि उससे सोच और संकटोंको सोच और संकट पड़ जाता है, ज्वर भी जलने लगते हैं, डूबी हुई ( नौका ) भी तर जाती है, बिगड़ी हुई बात भी सुधर जाती है, ऐसे पुरुषको देखकर वाम विधाताका स्वभाव भी अनुकूल हो जाता है, अभाग्य भाग जाता है, वैराग्य प्रेम करने लगता है और तुलसी-से निकम्मे और आलसीका भी भाग्य जाग जाता है । ( लूटनेको आयी हुई लुटेरोंकी ) सेना भी उलटे रक्षक और हितकारी बन जाती है तथा राम-नामका जप करनेसे आयी हुई मृत्यु भी टल जाती है। आँधरो अधम जड़ जाजरो जराँ जवनु सूकरकें सावक ढकाँ ढकेल्यो मगमं ।