भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 153

कवितावली १५० गिरो हियँ हहरि 'हराम हो, हराम हन्यो', हाय ! हाय ! करत परीगो कालफगमें ॥ 'तुलसी' बिसोक ह्वै त्रिलोकपतिलोक गयो नामकें प्रताप, बात बिदित है जगमें । सोई रामनामु जो सनेहसों जपत जनु, ताकी महिमा क्यों कही है जाति अगमैं ॥७६॥ एक सूअरके बच्चेने किसी अधम, अंधे, मूर्ख और बुढ़ापेसे जर्जर यवनको राहमें धक्का देकर ढकेल दिया । इससे वह गिर गया और हृदयमें भयभीत होकर 'अरे ! हरामने मार डाला, हरामने मार डाला' इस प्रकार हाय-हाय करते-करते कालके फंदेमें पड़ गया अर्थात् मर गया । गोसाईंजी कहते हैं कि वह यवन नामके प्रतापसे सब प्रकारके शोकोंसे छूटकर त्रिलोकीनाथ भगवान् रामके धामको चला गया, यह बात जगत्में प्रसिद्ध है । उसी रामनामको जो मनुष्य प्रेमपूर्वक जपता है, उसकी अगाध महिमा कैसे कही जा सकती है । जाप की न तप-खपु कियो, न तमाइ जोग, जाग न विराग, त्याग, तीरथ न तनको । भाईको भरोसो न खरो-सो वैरु बैरीहू सों, बलु अपनो न, हितू जननी न जनको ॥ लोकको न डरु, परलोकको न सोचु, देव- सेवा न सहाय, गर्बु धामको न धनको । रामही के नामतें जो होइ सोइ नीको लागै, ऐसोई सुभाउ कछु तुलसीके मनको ॥७७॥