कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५१ उत्तरकाण्ड मैंने न तो जप किया, न तपस्याका क्लेश सहा और न मुझे योग, यज्ञ, वैराग्य, त्याग अथवा तीर्थकी ही इच्छा है। मुझे भाईका भी भरोसा नहीं है, और न वैरीसे भी जरा-सी शत्रुता है। मुझे अपना बल नहीं है और माता-पिता भी अपने हितैषी नहीं हैं, परन्तु मुझे न तो इस लोकका डर है और न परलोकका ही सोच है। देवसेवाका भी मुझे बल नहीं है और न मुझे धन-धामका ही गर्व है। तुलसीके मनका कुछ इसी तरहका स्वभाव है कि भगवान् रामके नामसे ही जो कुछ होगा वही उसे अच्छा लगता है।
ईसु न, गनेसु न, दिनेसु न, धनेसु न, सुरेसु, सुर, गौरि, गिरापति नहि जपने। तुम्हरेई नामको भरोसो भव तरिबेको, बैठें-उठें 'जागत-बागत, सोएँ, सपनें॥ तुलसी है बावरो सो रावरोई, रावरी सौं, रावरेऊ जानि जियँ कीजिए जु अपने। जानकीरमन मेरे ! रावरें बदनु फेरें, ठाउँ न समाउँ कहाँ, सकल निरपने ॥७८॥
मुझे शिव, गणेश, सूर्य, कुवेर, इन्द्रादि देवता, गौरी अथवा ब्रह्माको नहीं जपना है। संसारसे तरनेके लिये उठते-बैठते, जागते- घूमते, सोने एवं स्वप्न देखते—बस, आपके नामका ही भरोसा है। तुलसी यद्यपि बावला है, परन्तु आपकी सौगंध, है आपका ही। इस बातको अपने चित्तमें जानकर आप भी उसे अपना लीजिये। हे मेरे जानकीनाथ ! आपके मुख फेर लेनेपर मेरे लिये कहीं ठौर- ठिकाना नहीं रहेगा, मैं कहाँ रहूँगा? सभी बिराने हैं।