भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 155

कवितावली १५२ जाहिर जहानमें जमानो एक भाँति भयो, बेंचिए विबुधधेनु, गसभी बेसाहिए। ऐसेऊ कराल कलिकालमें कृपाल! तेरे नामकें प्रताप न त्रिताप तन दाहिए॥ तुलसी तिहारो मन-बचन-करम, तॉहि नातें नेह-नेमु निज ओरतें निबाहिए। रंकके नेवाज रघुराज! राजा राजनिके, उमरि दराज महाराज तेरी चाहिए ॥७९॥ यह जमाना संसारमें इस बातके लिये प्रसिद्ध हो गया है कि कामधेनुको बेंचकर गधी खरीदी जाने लगी। ऐसे भयंकर कलिकालमें भी, हे कृपालो ! आपके नामके प्रतापसे त्रिताप (दैहिक, दैविक, भौतिक) से शरीर दग्ध नहीं होता। गोसाईं- जी कहते हैं, मन-वचन-कर्मसे मैं आपका (भक्त) हूँ। इसी नाते आप अपनी ओरसे भी स्नेहके नियमको निभाइये। हे रंकोंपर कृपा करनेवाले, राजाओंके राजा महाराज रघुनाथजी! हमें तो आपकी उमर बड़ी चाहिये [फिर कोई खटका नहीं है]। स्वारथ सयानप, प्रपंचु, परमारथ कहायो राम! रावरो हौं, जानत जहान है। नामकें प्रताप, बाप! आजु लौं निबाही नीकें, आगेको गोसाईं! स्वामी सबल सुजान है॥ कलिकी कुचालि देखि दिन-दिन दूनी, देव! पाहरूई चोर हेरि हिय हहरान है।