भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 157

कवितावली १५४ डपटकर माँगनेसे अपना दाँव पा लेते हैं और भले आदमीका बुरा हो जाता है । जैसे बालकको एकमात्र माँका ही सहारा होता है वैसे ही अपने तो एकमात्र सहारा सर्वसंकटोंसे छुड़ानेवाले और समर्थ श्रीसीतानाथका ही है । हे कृपालु रामजी ! तुलसीके साहसकी सराहना कीजिये कि वह ( आपके ) नामके भरोसे परिणामकी ओरसे निश्चिन्त हो गया है । मोह-मद मात्यो, रात्यो कुमति-कुनारिसों, बिसारि वेद-लोक-लाज, आँकरो अचेतु है । भावै सो करत, मुहँ आवै सो कहत, कछु काहूकी सहत नाहिं, सरकस हेतु है ॥ तुलसी अधिक अधमाई हू अजामिलतें, ताहूमैं सहाय कलि कपटनिकेतु है । जैबेको अनेक टेक, एक टेक ह्वैवेकी, जो पेट-प्रियपूत हित रामनामु लेतु है ॥८२॥ यह मोहरूपी मदसे उन्मत्त हो गया है, कुमतिरूपी कुलटा स्त्रीमें रत है, लोक और वेदकी लज्जाको त्याग कर बड़ा अचेत ( बेपरवाह ) हो गया है । मनमानी करता है और मुँहमें जो आता है वही [ बिना विचारे ] कह डालता है और उद्दण्डताके कारण किसीकी कोई बात सहता नहीं। गोसाईंजी कहते हैं कि इस प्रकार मुझमें अजामिलसे भी अधिक अधमता है; तिसपर भी कपटनिधान कलि मेरा सहायक है । बिगड़नेके तो अनेक मार्ग हैं परन्तु बननेका केवल एक रास्ता है; वह यह है कि यह पेटरूपी पुत्रके लिये रामनाम लेता है [ भाव यह है कि अधम अजामिल-