भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

१५५ उत्तरकाण्ड ने पुत्रके मिससे भगवान्‌का नाम लिया था। मैंने भी पेटरूपी पुत्रके लिये उसीका आश्रय लिया है ]। कलिवर्णन जागिए न सोइए, बिगोइए जनमु जायँ, दुख, रोग रोइए, कलेसु कोह-कामको। राजा-रंक, रागी और विरागी, भूरिभागी,ये अभागी जीव जरत, प्रभाउ कलि बामको ॥ तुलसी ! कबंध-कैसो धाइबो,विचारु, अंध ! धंध देखिअत जग, सोचु परिनामको । सोइबो जो रामके सनेहकी समाधि-सुखु, जागिबो जो जीह जपै नीकें रामनामको ॥८३॥ (इस संसारमें) न तो हम जागते हैं, न सोते हैं; जीवनको व्यर्थ खो रहे हैं। दुःख और रोगके कारण रोते हैं और काम- क्रोधका क्लेश (मानसिक व्यथा) सहते हैं। राजा-रंक, रागी- विरागी और महाभाग्यवान् तथा अभागी, सभी जीव जल रहे हैं; कुटिल कलियुगका ऐसा ही प्रभाव है। गोसाईंजी अपने लिये कहते हैं कि अरे अंधे ! विचार कर, इस जगत्‌में जितने धंधे दिखायी देते हैं वे सब कबन्ध (बिना सिरवाले रुण्ड) की दौड़के समान हैं, जिनका अन्त चिन्ता ही है। श्रीरामप्रेमकी समाधिका जो सुख है वही सोना है और जिह्वा भलीभाँति रामनाम जपे—यही जागना है। बरन-धरमु गयो, आश्रम निवासु तज्यो, त्रासन चकित सो परावनो परो-सो हैं ।

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