कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरमु, उपासना कुबासनाँ बिनास्यो ग्यानु, बचन-विराग, वेष जगतु हरो-सो है ॥ गोरख जगायो जोगु, भगति भगायो लोगु, निगम-नियोगतें सो केलि ही छरो-सो है । कायँ-मन-बचन सुभायँ तुलसी ! है जाहि रामनामको भरोसो, ताहिको भरोसो है ॥८४॥ इस कुसमयमें वर्णधर्म चला गया, ब्रह्मचर्यादि आश्रमोंने अपना स्थान छोड़ दिया । (अधर्मके) त्राससे चकित होकर भग्गी-सी पड़ी हुई है । कर्म, उपासना और ज्ञानको कुवासना (विषयभोगकी प्रबल इच्छा) ने नष्ट कर दिया है । वचनमात्रके वैराग्य और वेषने जगत्को ठग-सा लिया है । गोरखने योग क्या जगाया, लोगोंको भक्तिसे विमुख कर दिया, और वेदकी आज्ञाने खेलहीमें संसारको ठग-सा लिया है । गोसाईंजी कहते हैं कि जिसे शरीर, मन और वचनसे स्वाभाविक ही रामनामका भरोसा है उसीके सम्बन्धमें भरोसा होता है (कि वह संसारसे तर जायगा) । बेद-पुरान बिहाइ सुपंथु, कुमारग, कोटि कुचालि चली है । कालु कराल, नृपाल कृपाल न, राजसमाजु बड़ोई छली है ॥ बर्न-बिभाग न आश्रमधर्म, दुनी दुख-दोष-दरिद्र दली है । स्वारथको परमारथको कलि रामको नामप्रतापु बली है ॥८५॥ वेद-पुराणरूप सुमार्गको त्यागकर तरह-तरहकी कुचालें और करोड़ों कुमार्ग चल गये हैं । समय बड़ा कठिन है, राजा दयारहित हैं, राजसमाज (मन्त्री, कर्मचारी) बड़ा ही छली है ।