भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 160

१५७ उत्तरकाण्ड वर्णविभाग नहीं रहा, न आश्रमधर्म ही रहा है और संसारको दुःख, दोष और दरिद्रताने दलित कर दिया है। (ऐसे घोर) कलिकालमें स्वार्थ और परमार्थके लिये रामनामका प्रताप ही बलवान् है। न मिटै भवसंकटु, दुर्घट है तप, तीरथ जन्म अनेक अटो। कलिमें न विरागु, न ग्यानु कहूँ, सबु लागत फोकट झूठ-जटो ॥ नटु ज्यों जनि पेट-कुपेटक कोटिक चेटक-कौतुक-ठाट ठटो । तुलसी जो सदा सुखु चाहिअ तौ, रसनाँ निसिबासर रामु रटो८६ इस संसारका संकट मिट नहीं सकता; क्योंकि तप तो कठिन है; और तीर्थोंमें अनेक जन्मोंतक विचरते रहो, किन्तु कलियुगमें न कहीं वैराग्य है, न ज्ञान है; सब सारहीन और असत्यपूरित प्रतीत होता है। नटकी भाँति अपने पेटरूपी कुत्सित पेटारेसे करोड़ों इन्द्रजालके कौतुकका ठाट मत ठटो। गोसाईंजी कहते हैं कि जो सदा सुख चाहते हो तो जिह्वासे रात-दिन राम- नाम रटते रहो। दमु दुर्गम,दान,दया,मख,कर्म,सुधर्म, अधीन सबै धनको। तप,तीरथ,साधन,जोग,बिरागसों होइ,नहीं दृढ़ता तनको ॥ कलिकाल करालमें 'राम कृपालु'यहै अवलंबु बड़ो मनको। 'तुलसी'सब संजम हीन सबै, एक नाम-अधारु सदा जनको॥८७॥ दम अर्थात् इन्द्रियनिग्रह कठिन है। दान, दया, यज्ञ, कर्म और उत्तम धर्म सब धनके अधीन हैं। तप, तीर्थ और योगसाधन वैराग्यसे होते हैं, किन्तु (मनकी) दृढ़ता तनिक भी नहीं है। इस कराल कलिकालमें 'राम कृपालु हैं'—यही मनके लिये बड़ा