कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 161, कुल 228 में से
संदर्भ में पढ़ेंअवलम्बन है। गोसाईंजी कहते हैं कि सब लोग सब प्रकारके संयमोंसे रहित हैं; भक्तोंको सदैव एक राम-नामका ही आधार है। पाइ सुदेह त्रिमोह-नदी-तरनी न लही, करनी न कछू की। रामकथा बरनी न बनाइ, सुनी न कथा प्रहलाद न ध्रूकी ॥ अब जोर जरा जरि गातु गयो, मन मानि गलानि कुबानि न मूकी। नीकें कै ठीक दई तुलसी, अवलंब बड़ी उर आखर दूकी ॥८८॥ (मनुष्यकी) सुन्दर देह पाकर भी मोहरूपी नदीको पार करनेके लिये (भक्तिरूपी) नौका प्राप्त नहीं की और न कोई उत्तम करनी की। श्रीरामकथाको भलीभाँति नहीं गाया और न प्रह्लाद और ध्रुव (-जैसे भक्तों) की कथा सुनी। अब भरपूर वृद्धावस्थाके कारण शरीर जर्जर हो गया है, तथापि मनने ग्लानि मानकर अपनी कुटेव नहीं छोड़ी। इससे तुलसीने अच्छी तरह विचारकर यह निश्चय कर लिया है कि 'राम' इन दो अक्षरोंका ही हृदयमें बड़ा अवलम्ब है। राम-नाम-महिमा रामु बिहाइ 'मरा' जपतें बिगरी सुधरी कबिकोकिलहू की। नामहि तें गजकी, गनिकाकी, अजामिलकी चलि गै चलचूकी ॥ नामप्रताप बड़े कुसमाज बजाइ रही पति पांडुबधूकी । ताको भलो अजहूँ 'तुलसी' जेहि प्रीति-प्रतीति है आखर दूकी ॥ सीधा रामनाम त्याग कर उलटा 'मरा' 'मरा' जपनेसे कविकोकिल (श्रीवाल्मीकिजी) की बिगड़ी सुधर गयी। राम- नामसे ही गजकी और गणिकाकी बन गयी और अजामिलका धोखा भी चल गया। रामनामहीके प्रतापसे बड़े कुसमाजमें