भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 162

१५९ उत्तरकाण्ड अर्थात् दुर्योधनकी सभामें द्रौपदीकी लाज डंकेकी चोट रह गयी । गोसाईंजी कहते हैं कि जिसको 'राम' इन दोनों अक्षरोंमें प्रीति और प्रतीति है उसका अब भी भला ही है । नामु अजामिल-से खल तारन, तारन बारन-बारबधूको । नाम हरे प्रहलाद-विषाद, पिता-भय-साँसति-सागरु सूखो ॥ नामसों प्रीति-प्रतीति-विहीन गिल्यो कलिकाल कराल, न चूको । राखिहैं रामु सो जासु हिएँ तुलसी हुलसै बलु आखर दूको ॥ रामनाम अजामिल-जैसे खलोंको भी तारनेवाला है, गज और वेश्याका भी निस्तार करनेवाला है । नामहीने प्रह्लादके विषादका नाश किया और उनके पिता (हिरण्यकशिपु) से होनेवाले भय और साँसतरूपी समुद्रको सुखा दिया । रामनाममें जिसकी प्रीति और प्रतीति नहीं है, उसको कराल कलिकाल निगल जानेमें कभी नहीं चूका अर्थात् निगल ही गया । गोस्वामीजी कहते हैं कि जिसके हृदयमें 'रा' और 'म'—इन दो अक्षरोंका बल हुलसता है, उसकी रक्षा श्रीरामजी करेंगे । जीव जहानमें जायो जहाँ, सो तहाँ 'तुलसी' तिहुँ दाह दहो है । दोसु न काहू, कियो अपनो, सपनेहूँ नहीं सुखलेसु लहो है ॥ रामके नामतें होउ सो होउ, न सोउ हिएँ, रसना हीं कहो है । कियो न कछू, करिबोन कछू, कहिबो न कछू, मरिबोइ रहो है ॥ तुलसीदासजी कहते हैं—संसारमें जीव जहाँ भी उत्पन्न होता है वहीं तीनों तापोंसे जलता रहता है । (इसमें) किसीका दोष नहीं है, (सब) अपने ही कियेका फल है; इसीसे उसे स्वप्नमें भी लेशमात्र सुख नहीं मिलता । रामनामके प्रभावसे जो