कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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[Header] कवितावली ११०
कुछ होना हो सो (भले ही) हो, किन्तु उस नामको भी मैं हृदयसे नहीं लेता, केवल जिह्वासे ही कहता हूँ । इसके अतिरिक्त मैंने (आजतक) न तो कुछ किया है, न कुछ करना है और न कुछ कहना ही है । अब तो केवल मरना ही बाकी है। जीजे न ठाउँ, न आपन गाउँ, सुरालयहू को न संबलु मेरें । नामु रटो, जमत्रास क्यों जाउँ, को आइ सकै जमकिंकरु नेरें ॥ तुम्हरो सब भाँति, तुम्हारिअ सौं, तुम्ह ही बलि हौ मोको ठाहरु हेरे बैरख बाँह बसाइए पै तुलसी-घरु ब्याध-अजामिल खेरें ॥ मेरे पास जीवित रहनेके लिये भी कोई ठिकाना नहीं है। न तो कोई अपना गाँव है और न देवलोकमें जानेका ही कोई सामान है। मैंने रामनाम रटा है, इसलिये यमलोक भी कैसे जा सकता हूँ—(ऐसी दशामें) कौन यमदूत मेरे समीप आ सकता है। आपकी कसम, अब तो सब प्रकारसे मैं आपका ही हूँ, और बलिहारी जाऊँ, आपहीका मैंने आश्रय ढूँढ़ा है। अतः अब आप अपनी भुजारूप पताकाके नीचे व्याध और अजामिलके खेड़ेमें ही तुलसीदासका भी घर बसा दीजिये । का कियो जोगु अजामिलजू, गनिकाँ कबहीं मति पेम पगाई । ब्याधको साधुपनो कहिए, अपराध अगाधनि में ही जनाई ॥ करुनाकरकी करुना करुना हित, नाम-सुहेत जो देत दगाई । काहेको खीझिअ, रीझिअ पै, तुलसीहु सों है, बलि, सोइ सगाई ॥ अजामिलने कौन-सा योग साधा था और (पिङ्गल) वेश्याने अपनी बुद्धिको कब प्रभुके प्रेममें पागा था । भला, आप व्याधकी ही साधुता बतलाइये, वह तो अगाध अपराधोंमें ही दिखायी देती थी। करुणानिधान (श्रीराम) की जो करुणा है