भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 164

१६१ उत्तरकाण्ड वह तो करुणा करनेके ही लिये है [ अर्थात् वह तो अकारण ही सबपर रहती है, उसे प्राप्त करनेके लिये किसी गुणकी आवश्यकता नहीं है ] । जो नामका सुन्दर निमित्त लेकर आपको धोखा देता है, हे रघुनाथजी ! आप उससे रूठते क्यों हैं, कृपया प्रसन्न होइये । तुलसीदासके साथ भी आपका वही सम्बन्ध है, वह आपपर बलिहारी जाता है । जे मद-मार-विकार भरे, ते अचार-विचार समीप न जाहीं । है अभिमानु तऊ मनमें, जनु मागिहैं दूसरे दीनन पाहीं ? ॥ जौंकछु बात बनाइ कहौं, तुलसी तुम्ह में, तुम्हहू उर माहीं । जानकीजीवन ! जानत हौं, हम हैं तुम्हरे, तुम्ह में, सकु नाहीं ॥ जो पुरुष अभिमान और कामविकारसे भरे हैं वे आचार- विचारके पास भी नहीं फटकते । [ यह तुलसीदास भी ऐसा ही है ] तथापि इसके मनमें यह अभिमान है कि यह आपके सिवा किसी और दीन [ देवता या मनुष्य ] से याचना नहीं करेगा । तुलसीदासजी कहते हैं—यदि मैं कोई बात बनाकर कहता होऊँ तो मैं आपके अंदर हूँ और आप भी मेरे हृदयमें विराजमान हैं [ इसलिये आपसे कोई दुराव नहीं हो सकता ] । हे जानकी- जीवन ! आप यह जानते हैं कि हम आपके हैं और आपहीके अंदर रहते हैं —इसमें कोई सन्देह नहीं । दानव-देव, अहीस-महीस, महामुनि-तापस, सिद्ध-समाजी । जग जाचक, दानि दुतीय नहीं, तुम्ह ही सबकी सब राखत बाजी॥ एते बड़े तुलसीस ! तऊ सबरीके दिए बिनु भूख न भाजी । राम गरीबनेवाज ! भए हौ गरीबनेवाज गरीब नेवाजी ॥९५॥ क० ११--