भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 165

कवितावली १६२ दानव-देवता, शेषादि सर्पोंके राजा तथा पृथ्वीके राजा, महर्षि, तपस्वी और सिद्धगण—ये सब संसारमें माँगनेवाले ही हैं। आपके सिवा संसारमें कोई दूसरा दानी नहीं है; आप ही सबकी सारी बातें बनाते हैं। हे तुलसीश्वर ! आप इतने बड़े हैं, तो भी शबरीके दिये हुए (जूठे बेर) बिना आपकी भूख नहीं भागी। हे दीनोंके प्रतिपालक राम ! आप दीनोंकी रक्षा करके ही गरीब- निवाज हुए हैं (अतः मेरी भी रक्षा कीजिये)। किसबी, किसान-कुल, बनिक, भिखारी, भाट, चाकर, चपल नट, चोर, चार, चेटकी । पेटको पढ़त, गुन गढ़त, चढ़त गिरि, अटत गहन-गन अहन अखेटकी ॥ ऊँचे-नीचे करम, धरम-अधरम करि, पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी । 'तुलसी' बुझाइ एक राम घनस्याम ही तें, आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी ॥९६॥ श्रमजीवी, किसान, व्यापारी, भिखारी, भाट, सेवक, चञ्चल नट, चोर, दूत और बाजीगर, सब पेटहीके लिये पढ़ते, अनेक उपाय रचते, पर्वतोंपर चढ़ते और मृगयाकी खोजमें दुर्गम वनोंमें विचरते हैं। सब लोग पेटहीके लिये ऊँचे-नीचे कर्म तथा धर्म-अधर्म करते हैं, यहाँतक कि अपने बेटा-बेटी तकको बेच देते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—यह पेटकी आग बड़वाग्निसे भी बड़ी है; यह तो केवल एक भगवान् रामरूप श्याममेघके द्वारा बुझायी जा सकती है।