भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 167

कवितावली १६४ गति तुलसीसकी लखै न कोउ, जो करत पब्बतें छार, छारै पब्बय पलक हीं । कासों कीजै रोषु, दोषु दीजै काहि, पाहि, राम! कियो कलिकाल कुलि खललु खलक हीं ॥९८॥ सब लोग कुल, करनी, ऐश्वर्य, यश, सुन्दर रूप, गुण और यौवनके ज्वरमें जल रहे हैं ( अर्थात् नष्ट हो रहे हैं ); कहीं भी कल नहीं मिलता । इस रोगके लिये राजकार्य कुपथ्य है और नाना प्रकारके भोग इस रोगको बढ़ानेवाली दूषित सामग्री है । और वेदके जाननेवाले विद्या पाकर विवश हो प्रलाप करने लगते हैं । [ तात्पर्य यह कि कुल इत्यादिके अभिमानसे तो जलते ही थे, अब राजकार्य- रूपी कुपथ्य और भोगरूपी कुसमाज तथा वेद, बुद्धि और विद्या पाकर उन्मत्त हो गये हैं, अतएव कुछ सूझता नहीं । इसी कारण ] तुलसीदासके स्वामी ( श्रीरामचन्द्र ) की गतिको कोई नहीं जानता, जो पलमात्रमें पर्वतको खाक और खाकको पर्वत कर देते हैं । ( ऐसी स्थिति देखकर ) किसपर क्रोध किया जाय और किसको दोष दिया जाय । कलिकालने सारे संसारमें उपद्रव मचा दिया है; हे राम ! रक्षा कीजिये । बबुर-बहेरेको बनाइ बागु लाइयत, रूँधिबेको सोई सुरतरु काटियतु है । गारी देत नीच हरिचंदहू दधीचिहू को, आपने चना चबाइ हाथ चाटियतु है ॥ आपु महापातकी, हँसत हरि-हरहू को, आपु है अभागी, भूरिभागी डाटियतु है ।