कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 168, कुल 228 में से
संदर्भ में पढ़ें१४५ उत्तरकाण्ड कलिको कलुष मन मलिन किए महत, मसककी पाँसुरीं पयोधि पाटियतु है ॥९९॥ (कलिके वशीभूत होकर लोग ऐसे हो गये हैं कि) बबूर और बहेड़ेका बाग लगाकर उसकी बाड़ बनानेके लिये कल्पवृक्ष- को काटकर लाते हैं और ऐसे नीच हो गये हैं कि हरिश्चन्द्र और दधीचिको भी गाली देते हैं [जिन्होंने परोपकारार्थ शरीरतक दान कर दिया था] और अपने चने चबाकर भी हाथ चाटते हैं [कि कहीं कुछ लगा तो नहीं है, अर्थात् परम दरिद्री हैं]; अपने तो महापातकी हैं, परन्तु विष्णुभगवान् और शिवजीतकको हँसते हैं; स्वयं भाग्यहीन हैं परन्तु बड़े-बड़े भाग्यवानोंको डाँट देते हैं। कलिके पापोंने सबके मनोंको अत्यन्त मलिन कर दिया है परन्तु [ऐसी अवस्था में भी ये लोक-परलोक सुधारना चाहते हैं।] मानो मच्छरकी पसलियोंसे (अपार) समुद्रको पाटना चाहते हैं। सुनिए कराल कलिकाल भूमिपाल ! तुम्ह जाहि घालो चाहिए, कहौं धौं, राखै ताहि को। हौं तौ दीन दूबरो, बिगारो-ढारो रावरो न, मैंहू तैंहू ताहिको, सकल जगु जाहिको ॥ कामु, कोहु लाइ कै देखाइयत आँखि मोहि, एते मान अकसु कीबेको आपु आहि को। साहेब सुजान, जिन्ह स्वानहू को पच्छु कियो, रामबोला नामु, हौं गुलामु रामसाहिको ॥१००॥ हे कराल कलिकाल महाराज ! सुनो, जिसको तुम नष्ट