भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 228 में से

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पृष्ठ 169

कवितावली १६६ करना चाहो उसकी रक्षा, भला, कौन कर सकता है। मैं तो दीन- दुर्बल हूँ, और आपका कुछ भी बिगाड़ा-गिराया नहीं। मैं भी और तुम भी उसी (ईश्वर) के हैं जिसका यह सारा संसार है। तुम जो काम-क्रोधको मेरे पीछे लगाकर मुझे आँखें दिखलाते हो सो तुम इतना विरोध करनेवाले कौन हो ? मेरे स्वामी (श्रीरामचन्द्रजी) बड़े विज्ञ हैं अर्थात् वे सब जानते हैं; उन्होंने श्वानका भी पक्ष किया था* । मैं तो रामशाहका गुलाम हूँ और रामबोला मेरा नाम है। [फिर वे मेरा पक्ष क्यों न करेंगे ?] साँची कहौ, कलिकाल कराल ! मैं ढारो-बिगारो तिहारो कहा है। कामको, कोहको, लोभको, मोहको मोहिसों आनि प्रपंचु रहा है ॥ हौ जगनायकु लायक आजु, पै मेरिऔ टेव कुटेव महा है। जानकीनाथ बिना 'तुलसी' जग दूसरेसों करिहौं न हहा है १०१ हे कराल कलिकाल ! सच कहो, मैंने तुम्हारा क्या ढाला या बिगाड़ा है ? क्या यह काम, क्रोध, लोभ और मोहका जाल रच मुझीपर फैलाना था । तुम आज जगत्‌के स्वामी और बड़े

  • एक दिन श्रीरामजीके राजदरबारमें एक कुत्ता आया और रोता हुआ कहने लगा—'महाराज ! तीर्थसिद्धि नामक ब्राह्मणने बिना ही अपराध लाठीसे मेरा सिर फोड़ दिया, आप मेरा न्याय कर दीजिये ।' भगवान्‌ने ब्राह्मणको बुलाया और उससे पूछा कि 'तुमने निरपराध कुत्तेके सिरमें क्यों लाठी मारी ?' ब्राह्मणने कहा कि 'मैं भीख माँगता फिरता था, इसे मैंने रास्तेसे हटाया; जब यह न हटा, तब मैंने लकड़ी मार दी ।' ब्राह्मणको अदण्डनीय समझकर भगवान् विचार करने लगे । इतनेमें कुत्तेने कहा कि 'भगवन् ! आप इसे कालंजरका महंत बना दीजिये । मैं भी पूर्वजन्ममें एक महंत था। भक्ष्याभक्ष्य खानेसे मुझे कुत्ता होना पड़ा; महंती बहुत बुरी है।' कुत्तेके कहनेपर भगवान्‌ने उसे कालंजरका महंत बना दिया ।
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