भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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१६७ उत्तरकाण्ड सामर्थ्यवान् हो । परन्तु हे देव ! मेरी भी यह बहुत बुरी आदत है कि जानकीनाथ (श्रीराम) के बिना किसी दूसरेके सामने हाहा नहीं खाता, यानी अपनी रक्षाके लिये प्रार्थना नहीं करता । भागीरथीजलु पान करौं, अरु नाम द्वै रामके लेत नितै हौं। मोको न लेनो, न देनो कछू, कलि! भूलि न रावरी ओर चितैहौं। जानि कै जोरु करौ, परिनाम तुम्हें पछितैहौं, पै मैं न भितैहौं । ब्राह्मन ज्यों उगिल्यो उरगारि, हौं त्यों हीं तिहारें हिएँ न हितैहौं १०२ मैं गङ्गाजल पीता हूँ और नित्य रामके दो नाम लेता हूँ। हे कलिकाल ! मुझे तुमसे कुछ भी लेना-देना (सरोकार) नहीं है और मैं भूलकर भी तुम्हारी ओर नहीं देखूँगा । यदि तुम जान बूझकर मेरे साथ जोर (अत्याचार) करोगे तो परिणाममें तुम्हीं पछताओगे, मैं नहीं डरूँगा । जिस तरह गरुड़ने ब्राह्मणको नहीं पचनेके कारण उगल दिया वैसे मैं भी तुम्हारे पेटमें नहीं पचूँगा* । राजमरालके बालक पेलि कै पालत-लालत खूसरको । सुचि सुंदर सालि सकेलि, सोवारि कै, बीजु बटोरत ऊसरको ॥ गुन-ग्यान-गुमानु, अँधेरि बड़ी, कल्पद्रुमु काटत मूसरको । कलिकाल बिचारु अचारु हरो, नहि सूझै कछू धमधूसरको १०३ लोग राजहंसके बच्चेको ठेलकर उल्लूके बच्चेका लालन- पालन करते हैं; सुन्दर और पवित्र धानको बटोर और जलाकर ऊसर भूमिके लिये बीज बटोरते हैं । गुण और ज्ञानका बड़ा

  • गरुड़जी एक समय धोखेसे एक ब्राह्मणको निगल गये । इससे उनके पेटमें जलन पैदा हुई । अन्तमें उन्हें उसे अपने पेटमेंसे निकाल देना पड़ा ।
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