भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 172

१६९ उत्तरकाण्ड वेद, शास्त्र और पुराण करोड़ों मार्गोंका वर्णन करते हैं, परन्तु वे समझमें नहीं आते और जो मुनिलोग हैं वे अपने आपको ही ईश्वर, सिद्ध और चतुर कहलावाने हैं। जितने धर्म थे उन सबको कलियुग लील गया है तथा जप, योग और वैराग्यादि अपनी-अपनी जान लेकर भाग गये हैं। गोसाईंजी कहते हैं कि इनका सोच करके कौन मरे ? हम तो जानकीनाथ श्रीरामचन्द्रके हाथ बिक गये हैं। धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूत कहौ, जोलहा कहौ कोऊ। काहूकी बेटी सों, बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ॥ तुलसी सरनाम गुलामु है रामको, जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ ॥ माँगि कै खैबो, मसीतको सोइबो, लैबेको एकु न दैवे को दोऊ १०६ चाहे कोई धूर्त कहे, अथवा परमहंस कहे, राजपूत कहे या जुलाहा कहे, मुझे किसीकी बेटीसे तो बेटेका ब्याह करना नहीं है; न मैं किसीसे सम्पर्क रखकर उसकी जाति ही बिगाडूंगा। तुलसीदास तो श्रीरामचन्द्रका प्रसिद्ध गुलाम है, जिसको जो रुचे सो कहो। मुझको तो माँगके खाना और मसजिद (देवालय) में सोना है; न किसीसे एक लेना है, न दो देना है। मेरो जाति-पाँति न चहौं काहूकी जाति-पाँति, मेरो कोऊ कामको न हौं काहूके कामको। लोकु परलोकु रघुनाथही के हाथ सब, भारी है भरोसो तुलसीकें एक नामको ॥ अति ही अयाने उपखानो नहिं बूझैं लोग, 'साह ही को गोतु गोतु होत है गुलामको।'