कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १७० साधु कै असाधु, कै भलो कै पोच, सोचु कहा, का काहूके द्वार परों, जो हौं सो हौं रामको ॥१०७॥ मेरी कोई जाति-पाँति नहीं है और न मैं किसीकी जाति-पाँति चाहता हूँ। कोई मेरे कामका नहीं है और न मैं किसीके कामका हूँ। मेरा लोक-परलोक सब श्रीरामचन्द्रके हाथ है। तुलसीको तो एकमात्र रामनामका ही बहुत बड़ा भरोसा है। लोग अत्यन्त गँवार हैं—कहावत भी नहीं समझते कि जो गोत्र स्वामीका होता है वही सेवकका होता है। साधु हूँ अथवा असाधु, भला हूँ अथवा बुरा, इसकी मुझे कोई परवा नहीं है। मैं जैसा कुछ भी हूँ, श्रीरामचन्द्रका हूँ। क्या मैं किसीके दरवाजेपर पड़ा हूँ ? कोऊ कहै, करत कुसाज, दगाबाज बड़ो, कोऊ कहै, रामको गुलामु खरो खूब है। साधु जानै महासाधु, खल जानै महाखल, बानी झूठी-साँची कोटि उठत हबूब है॥ चहत न काहूसों न कहत काहूकी कछु, सबकी सहत, उर अंतर न ऊब है। तुलसीको भलो पोच हाथ रघुनाथ ही के, रामकी भगति-भूमि मेरी मति दूब है ॥१०८॥ कोई कहता है कि (यह तुलसी) कुसाज अर्थात् छल, कपट आदि करता है, कोई कहता है कि यह बड़ा दगाबाज है और कोई कहता है कि यह श्रीरामचन्द्रका खूब सच्चा सेवक है। साधु मुझे परम साधु जानते हैं और दुष्ट महादुष्ट समझते हैं। झूठी-सच्ची करोड़ों प्रकारकी बातोंकी लहरें उठा करती हैं। मैं तो किसीसे कुछ चाहता