कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ उत्तरकाण्ड नहीं, न किसीके विषयमें कुछ कहता हूँ; सबकी सहता हूँ, चित्तमें कोई घबराहट नहीं है। तुलसीका बुरा-भला तो रघुनाथजीके ही हाथ है; मेरी बुद्धि रामभक्तिरूप भूमिमें दूबके समान है, अर्थात् मेरी बुद्धिका परम आश्रय रामभक्ति ही है। जागैं जोगी-जंगम, जती-जमाती ध्यान धरैं, डरैं उर भारी लोभ, मोह, कोह, कामके। जागैं राजा राजकाज, सेवक-समाज, साज, सोचैं सुनि समाचार बड़े वैरी बामके॥ जागैं बुध विद्या हित पंडित चकित चित, जागैं लोभी लालच धरनि, धन, धामके। जागैं भोगी भोग हीं, वियोगी, रोगी सोगबस, सोवैं सुख तुलसी भरोसे एक रामके ॥१०९॥ योगी, जंगम (परिव्राजक अथवा लिंगायत साधु), संन्यासी और मण्डली बनाकर रहनेवाले साधु इसलिये जागते हैं कि (एक ओर तो वे परमेश्वरका) ध्यान करते हैं और (दूसरी ओर) उनके मनमें काम, क्रोध, मोह, लोभका बड़ा भारी डर बना रहता है। राजालोग राजकाज, सेवकमण्डल तथा अनेकों प्रकारकी सामग्रीके पीछे जागते रहते हैं और बड़े-बड़े प्रतिकूल शत्रुओंके समाचारको सुनकर सोचग्रस्त रहते हैं। बुद्धिमान् पण्डितलोग विद्याके लिये; लोभी पुरुष पृथ्वी, धन और घरके लोभमें जागते हैं; भोगी लोग भोगके लिये और वियोगी और रोगी लोग [विरह