भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 175

कवितावली १७२ एवं रोगके सन्तापके कारण जागते हैं । किन्तु तुलसीदास तो एक रामजीके भरोसे सुखपूर्वक सोता है । रामु मातु, पितु, बंधु, सुजनु, गुरु, पूज्य, परमहित । साहेबु, सखा, सहाय, नेह-नाते पुनीत चित ॥ देसु, कोसु, कुलु, कर्म, धर्म, धनु, धामु, धरनि, गति । जाति-पाँति सब भाँति लागि रामहि हमारि पति ॥ परमारथु, स्वारथ, सुजसु, सुलभ रामतें सकल फल । कह तुलसिदासु, अब, जब-कबहूँ एक रामतें मोर भल ॥११०॥ हमारे माता, पिता, बन्धु, आत्मीय, गुरु, पूज्य और परम हितकारी राम ही हैं । राम ही हमारे स्वामी, सखा और सहायक हैं तथा पवित्र चित्तसे जितने प्रेमके सम्बन्ध हैं, सब राम ही हैं । हमारे देश, कोश, कुल, धर्म-कर्म, धन, धाम और गति भी राम ही हैं । हमारे जाति-पाँति भी राम ही हैं और हमारी प्रतिष्ठा भी सब प्रकार श्रीरामहीके पीछे हैं । परमार्थ, स्वार्थ, सुयश, सब प्रकारके फल हमें रामहीसे सुलभ हैं । गोसाईंजी कहते हैं कि अभी या जब कभी हो, मेरा भला तो एक रामहीसे होगा । रामगुणगान महाराज, बलि जाउँ, राम ! सेवक-सुखदायक । महाराज, बलि जाउँ, राम ! सुंदर, सब लायक ॥ महाराज, बलि जाउँ, राम ! सब संकट मोचन । महाराज, बलि जाउँ, राम ! राजीवविलोचन ॥