भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

कवितावली १७२ एवं रोगके सन्तापके कारण जागते हैं । किन्तु तुलसीदास तो एक रामजीके भरोसे सुखपूर्वक सोता है । रामु मातु, पितु, बंधु, सुजनु, गुरु, पूज्य, परमहित । साहेबु, सखा, सहाय, नेह-नाते पुनीत चित ॥ देसु, कोसु, कुलु, कर्म, धर्म, धनु, धामु, धरनि, गति । जाति-पाँति सब भाँति लागि रामहि हमारि पति ॥ परमारथु, स्वारथ, सुजसु, सुलभ रामतें सकल फल । कह तुलसिदासु, अब, जब-कबहूँ एक रामतें मोर भल ॥११०॥ हमारे माता, पिता, बन्धु, आत्मीय, गुरु, पूज्य और परम हितकारी राम ही हैं । राम ही हमारे स्वामी, सखा और सहायक हैं तथा पवित्र चित्तसे जितने प्रेमके सम्बन्ध हैं, सब राम ही हैं । हमारे देश, कोश, कुल, धर्म-कर्म, धन, धाम और गति भी राम ही हैं । हमारे जाति-पाँति भी राम ही हैं और हमारी प्रतिष्ठा भी सब प्रकार श्रीरामहीके पीछे हैं । परमार्थ, स्वार्थ, सुयश, सब प्रकारके फल हमें रामहीसे सुलभ हैं । गोसाईंजी कहते हैं कि अभी या जब कभी हो, मेरा भला तो एक रामहीसे होगा । रामगुणगान महाराज, बलि जाउँ, राम ! सेवक-सुखदायक । महाराज, बलि जाउँ, राम ! सुंदर, सब लायक ॥ महाराज, बलि जाउँ, राम ! सब संकट मोचन । महाराज, बलि जाउँ, राम ! राजीवविलोचन ॥

१७३ उत्तरकाण्ड बलि जाउँ, राम ! करुनायनन, प्रनतपाल, पातकहरन । बलि जाउँ, राम! कलि-भय-विकल तुलसिदासु राखिअ सरन १११ हे महाराज ! हे सेवकसुखदायक राम ! मैं आपकी बलि जाता हूँ । हे महाराज ! हे सुन्दर और सर्वसमर्थ राम ! मैं आपकी बलि जाता हूँ । हे महाराज ! हे राम ! आप सब संकटोंसे छुड़ाने- वाले हैं । मैं आपकी बलि जाता हूँ । हे कमलनयन महाराज राम ! मैं आपपर बलिहारी हूँ । आप करुणाके धाम, शरणागत- रक्षक और पापोंको दूर करनेवाले हैं । हे राम ! मैं आपकी बलि जाता हूँ, कलिकालके भयसे व्याकुल तुलसीदासको आप अपनी शरणमें रखिये । जय ताड़का-सुबाहु-मथन मारीच-मानहर ! मुनिमख-रच्छन-दच्छ, सिलातारन, करुनाकर ! नृपगन-बल-मद सहित संभु-कोदंड-विहंडन ! जय कुठारघरदर्पदलन दिनकरकुलमंडन ॥ जय जनकनगर-आनंदप्रद, सुखसागर, सुषमाभवन ! कह तुलसिदासु, सुरमुकुटमनि, जय जय जय जानकिरवन !११२ ताड़का और सुबाहुका नाश करनेवाले, मारीचके मदको तोड़नेवाले, विश्वामित्र मुनिके यज्ञकी रक्षामें दक्ष, शिलारूप अहल्या- को तारनेवाले, करुणाकी खानि, राजाओंके मदसहित शिवजीके धनुषको तोड़नेवाले ! आपकी जय हो । कुठारधर परशुरामके अभिमानको चूर्ण करनेवाले, सूर्यकुलभूषण भगवान् राम ! आपकी जय हो । जनकपुरीको आनन्द देनेवाले, परम सुखसागर, शोभाधाम श्रीरामचन्द्रजी ! आपकी जय हो । तुलसीदासजी कहते हैं कि

कवितावली १७४ देवताओंके मुकुटमणि, जानकीरमण श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो ! जय हो !! जय हो !!! जय जयंत-जयकर, अनंत, सज्जनजनरंजन ! जय विराध-वध विदुष, विबुध-मुनिगन-भय-भंजन ! जय निसिचरी-विरूप-करन रघुवंसविभूषन ! सुभट चतुर्दस-सहस दलन त्रिसिरा-खर-दूषन ॥ जय दंडकवन-पावन-करन, तुलसिदास-संसय-समन ! जगविदित, जगतमनि, जयति जय जय जय जय जानकिरमन !॥ जयन्तको जीतनेवाले, अन्तरहित और साधुजनोंको आनन्द देनेवाले रामजी ! आपकी जय हो । विराधके वधमें कुशल तथा देवता और मुनिगणोंका भय दूर करनेवाले प्रभु राम ! आपकी जय हो । राक्षसी ( शूर्पणखा ) को रूपरहित करनेवाले, रघुकुलके भूषण ! आपकी जय हो । चौदह सहस्र वीरों और खर, दूषण, त्रिशिराका नाश करनेवाले ! आपकी जय हो । दण्डकवनको पवित्र करनेवाले तथा तुलसीदासके संशयका नाश करनेवाले ! आपकी जय हो । संसारमें प्रख्यात तथा जगत्‌के प्रकाशक जानकीरमण भगवान् राम ! आपकी जय हो ! जय हो !! जय हो !!! जय मायामृगमथन, गीध-सबरी-उद्धारन ! जय कबंधसूदन बिसाल तरु ताल बिदारन ! दवन बालि बलसालि, थपन सुग्रीव, संतहित ! कपि कराल भट भालु कटक पालन, कृपालचित !

१७५ उत्तरकाण्ड जय सिय-वियोग-दुख हेतु कृत-सेतुबंध-वारिधिदमन ! दसर्मीस विभीषन अभयप्रद, जय जय जय जानकिरमन! ॥११४॥ मायामृगरूप मारीचको मारनेवाले तथा जटायु और शबरीका उद्धार करनेवाले भगवान् राम ! आपकी जय हो । कबन्धको मारनेवाले और बड़े-बड़े ताड़के वृक्षोंको विदीर्ण करनेवाले प्रभु राम ! आपकी जय हो ! बलसम्पन्न बालिका नाश करनेवाले, सुग्रीवको राज्य देनेवाले तथा संतोंका हित करनेवाले ! आपकी जय हो । भयानक भालु और वानर वर्गोंके कटकका पालन करनेवाले दयार्द्रचित्त रघुनाथजी ! आपकी जय हो । जानकीजीके वियोगजनित दुःखके कारण समुद्रका दमन करके उसपर सेतु बाँधनेवाले रामजी ! आपकी जय हो । तथा रावणसे विभीषणको अभय देनेवाले हे जानकीरमण ! आपकी जय हो ! जय हो !! जय हो !! रामप्रेमकी प्रधानता कनकभूधरु केदारु, बीजु सुंदर सुरमनि बर । सींचि कामधुक धेनु सुधामय पय विसुद्धतर ॥ तीरथपति अंकुरसरूप जच्छेस रच्छ तेहि । मरकतमय साखा-सुपत्र, मंजरिय लच्छि जेहि ॥ कैवल्य सकल फल, कलपतरु सुभ सुभाव सब सुख वरिस । कह तुलसिदास, रघुबंसमनि ! तौ कि होइ तुअ कर सरिस॥११५॥ सुमेरु पर्वत थाल्हा हो, सुन्दर चिन्तामणि बीज हो, कामधेनुके अमृतमय अत्यन्त शुद्ध दुग्धसे उसे सींचा जाय, उससे तीर्थराज प्रयाग अंकुररूपसे प्रकट हो, उसकी रक्षा स्वयं कुबेरजी

कवितावली १७६ करें, उसकी मरकतमणिमय शाखा और पत्ते हों और मञ्जरी साक्षात् लक्ष्मीजी हों तथा सब प्रकारकी मुक्तियाँ ही जिसके फल हों, ऐसा वह कल्पतरु स्वभावसे ही सब प्रकारके मङ्गल और सुखोंकी वर्षा करता हो, तो भी, तुलसीदासजी कहते हैं—हे रघुवंशमणि ! वह कल्पवृक्ष क्या कभी आपके हाथोंके बराबर हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता। जाय सो सुभटु समर्थ पाइ रन रारि न मंडै । जाय सो जती कहाय विषय-वासना न छंडै ॥ जाय धनिकु बिनु दान, जाय निर्धन बिनु धर्महि । जाय सो पंडित पढ़ि पुरान जो रत न सुकर्महिं ॥ सुत जाय मातु-पितु-भक्ति बिनु, तिय सो जाय जेहि पति न हित। सब जाय दासु तुलसी कहै, जौं न रामपद नेहु नित॥११६॥ वह समर्थ वीर व्यर्थ है जो संग्राम ( का अवसर ) पाकर भी युद्ध नहीं करता । जो यति ( संन्यासी अथवा विरक्त ) कहला- कर विषयकी वासनाको न छोड़े वह विरक्त भी व्यर्थ है । दानशून्य धनी और धर्माचरणशून्य निर्धन भी व्यर्थ है । जो पण्डित पुराण पढ़कर सुकर्ममें रत नहीं है वह भी नष्ट है । जो पुत्र माता-पिताकी भक्तिरहित है वह भी नष्ट है और जिसे पति प्यारा नहीं है वह स्त्री भी व्यर्थ है । तुलसीदासजी कहते हैं—यदि श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें नित्य नवीन प्रेम न हो तो सभी कुछ व्यर्थ है । को न क्रोध निरदह्यो, काम बस केहि नहि कीन्हो ? को न लोभ दृढ़ फंद बाँधि त्रासन करि दीन्हो ?

१७७ उत्तरकाण्ड कौन हृदयँ नहि लाग कठिन अति नारि-नयन-सर ? लोचनजुत नहि अंध भयो श्री पाइ कौन नर ? सुर-नाग-लोक महिमंडलहुँ को जु मोह कीन्हो जय न ? कह तुलसिदासु सो ऊबरै, जेहि राख रामु राजिवनयन ॥११७॥ क्रोधने किसको नहीं जलाया ? कामने किसको वशीभूत नहीं किया ? लोभने किसको दृढ़ फाँसीमें बाँधकर त्रस्त नहीं किया ? किसके हृदयमें स्त्रियोंके नेत्ररूपी कठिन बाण नहीं लगे ? और कौन मनुष्य धन पाकर आँखोंके रहते हुए भी अंधा नहीं हुआ ? सुरलोक, पृथ्वीमण्डल ( नरलोक ) तथा नागलोक अर्थात् पाताललोकमें ऐसा कौन है जिसको मोहने न जीता हो । गोसाईं तुलसीदासजी कहते हैं कि इनसे तो वही बच सकता है जिसकी रक्षा कमलनयन श्रीरामजी करते हैं । भौंह-कमान सँधान सुठान जे नारि-बिलोकनि-बानतें बँचे । कोप-कृसानु गुमानु-अवाँ घट ज्यों जिनके मन आव न आँचे ॥ लोभ सबै नटके बस ह्वै कपि-ज्यों जगमें बहु नाच न नाचे । नीके हैं साधु सबै तुलसी, पै तेई रघुवीरके सेवक साँचे ॥ जो लोग भ्रुकुटिरूप कमानपर अच्छी प्रकार चढ़ाये हुए कामिनीकटाक्षरूप बाणसे बचे हुए हैं, अभिमानरूप अवाँमें क्रोधरूप अग्निकी ज्वालासे जिनके मन घड़ेकी भाँति नहीं तपे हों तथा जो लोभरूप नटके अधीन होकर संसारमें बंदरकी तरह अनेक नाच नहीं नाचे-तुलसीदासजी कहते हैं-वे ही भगवान् श्रीरामके सच्चे दास हैं । यों तो सभी साधु अच्छे हैं । क० १२-

कवितावली १७८ वेष सुबनाइ सुचि वचन कहैं चुबाइ जाइ तौ न जरनि धरनि-धन-धामकी । कोटिक उपाय करि लालि पालिअत देह, मुख कहिअत गति रामहीके नामकी ॥ प्रगटैं उपासना, दुरावैं दुरवासनाहि, मानस निवासभूमि लोभ-मोह-कामकी । राग-रोष-ईरिषा-कपट-कुटिलाई भरे तुलसी-से भगत भगति चहैं रामकी ॥११९॥ जो लोग उत्तम (साधुका-सा) वेष बनाकर पवित्र एवं अमृत चूते हुए वचन बोलते हैं, किन्तु जिनके हृदयसे पृथ्वी, धन और घरकी आग (तृष्णा) दूर नहीं होती; जो करोड़ों उपाय करके शरीरका लालन-पालन करते हैं, किन्तु मुखसे कहते हैं कि हमें तो केवल रामनामका ही भरोसा है; जो अपनी उपासनाको तो प्रकट करते हैं; किन्तु अपनी बुरी वासनाओंको छिपाते हैं तथा जिनके चित्त लोभ, मोह और कामके निवास- स्थान बने हुए हैं, तुलसीदास कहते हैं—वे आसक्ति, क्रोध, ईर्ष्या, कपट और कुटिलतासे भरे हुए मेरे-जैसे भक्त भी रामकी भक्ति चाहते हैं ! [अर्थात् जो पुरुष ऐसे कुटिल आचरण करते हुए भी भगवान्‌को रिझानेकी आशा रखते हैं, वे बड़े ही हास्यास्पद हैं ।] कालिहीं तरुन तन, कालिहीं धरनि-धन, कालिहीं जितौंगो रन, कहत कुचालि है । कालिहीं साधौंगो काज, कालिहीं राजा-समाज,

मसक हूँ कहै, 'भार मेरे मेरु हालिहैं' ॥ तुलसी यही कुभाँति घने घर घालि आई, घने घर घालति हैं, घने घर घालिहैं। देखत-सुनत-समुझतहू न सूझै सोई, कबहुँ कह्यो न कालहू को कालु कालि हैं ॥१२०॥ कुचाली लोग कहते हैं—मुझे कल ही तरुण शरीर प्राप्त हो जायगा, कल ही भूमि और धन प्राप्त हो जायेंगे और कल ही मैं युद्धमें विजय प्राप्त कर लूँगा, कल ही मैं अपने सारे कार्य सिद्ध कर लूँगा और कल ही मैं राज-समाज जोड़ दूँगा। मच्छरके समान होकर भी वे कहते हैं, मेरे बोझसे मेरु पर्वत भी हिल जायगा। तुलसीदासजी कहते हैं—इस कुप्रवृत्तिके कारण बहुत-से घर नष्ट हो गये हैं, इस समय भी नष्ट होते हैं तथा आगे भी होंगे। परन्तु यह सब देख, सुन और समझकर भी वह कुप्रवृत्ति लोगोंको दीख नहीं पड़ती और न किसीने कभी यह कहा कि काल (आयु) का भी काल (अन्त) कल ही है।

रामभक्तिकी याचना भयो न त्रिकाल तिहुँ लोक तुलसी-सो मंद निंदैं सब साधु, सुनि मानौं न सकोचु हौं। जानत न जोगु, हियँ हानि मानैं जानकीसु, काहे को परेखो, पापी प्रपंची पोचु हौं॥ पेट भरिबेके काज महाराज-को कहायौ महाराजहूँ कह्यो है प्रनत-बिमोचु हौं।

कवितावली १८० निज अघजाल, कलिकालकी करालता बिलोकि होत व्याकुल, करत सोई सोचु हौं ॥१२१॥ भूत, भविष्यत् और वर्तमान, तीनों कालोंमें त्रिलोकीमें तुलसीदासके समान नीच कोई नहीं हुआ। सभी साधुजन इसकी निन्दा करते हैं, परन्तु मैं सुनकर भी संकोच नहीं मानता। जानकीनाथ भगवान् राम भी इसे योग्य नहीं समझते, इसीसे मुझे अपनानेमें उन्हें अपने चित्तमें हानि जान पड़ती है। मुझे इस बात- की शिकायत भी क्यों होनी चाहिये; क्योंकि वास्तवमें ही मैं बड़ा पापी, पाखण्डी और नीच हूँ। मैं पेट भरनेके लिये ही महाराजका कहलाया और महाराजने भी कहा है कि मैं अपने शरणागतका उद्धार कर देता हूँ। किन्तु अपनी पापराशि और कलिकालकी कुटिलता देखकर मैं व्याकुल हो जाता हूँ और उसी (अपने उद्धारके ही) विषयमें चिन्ता करने लगता हूँ। धर्मकें सेतु जगमंगलके हेतु भूमि- भारु हरिवेको अवतारु लिये नरको। नीति औ प्रतीति-प्रीतिपाल चालि प्रभु, मानु लोक-वेद राखिवेको पनु रघुबरको ॥ बानर-बिभीषनकी ओर के कनावड़े हैं, सो प्रसंगु सुनैं अंगु जरै अनुचरको। राखे रीति आपनी जो होइ सोई कीजै, बलि, तुलसी तिहारो घर जायऊ है घरको ॥१२२॥

१८१ उत्तरकाण्ड धर्मके सेतु भगवान् संसारका कल्याण करनेके लिये और पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही मनुष्यके रूपमें अवतीर्ण हुए; नीति, प्रतीति और प्रीतिका पालन करना प्रभुका स्वभाव ही है तथा लोक और वेदकी मर्यादा रखना यह भी श्रीरघुवीरका प्रण है । आप सुग्रीव और विभीषणके ऋणी हैं, यह बात सुनकर दासका अङ्ग-अङ्ग जलता है [कि मुझपर ऐसी कृपा क्यों नहीं करते ?] । अतः मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ, अपने प्रणकी रक्षा करके आपसे जो बने वही कीजिये । यह तुलसीदास तो आपके घरका घर-जाया (पुस्तैनी) सेवक है। नाम महाराजके निबाह नीको कीजै उर सबही सोहात, मैं न लोगनि सोहात हौं । कीजै राम ! बार यहि मेरी ओर चष-कोर, ताहि लागि रंक ज्यों सनेहको ललात हौं ॥ तुलसी बिलोकि कलिकालकी करालता कृपालको सुभाउ समुझत सकुचात हौं । लोक एक भाँतिको, त्रिलोकनाथ लोकवस आपनो न सोचु, स्वामी-सोचहीं सुखात हौं ॥१२३॥ महाराजके नामके साथ अच्छी प्रकार निर्वाह करनेवाला (अर्थात् राम-नाम जपनेवाला) मनसे सबको अच्छा लगता है, परन्तु मैं लोगोंको अच्छा नहीं लगता । अतः हे राम ! इस बार आप मेरी ओर कृपादृष्टि कीजिये, आपके कृपाकटाक्षके लिये मैं लालयित हूँ। जिस प्रकार दरिद्र स्नेहके लिये अथवा स्नेहयुक्त पदार्थों (पकवानों) के लिये लालयित रहता है । तुलसीदासजी कहते हैं—मैं कलिकालकी करालता और कृपालु प्रभुके स्वभावको

कवितावली १८२

समझकर सकुचाता हूँ। इस समय सारा संसार एक-सा हो रहा है [सभी मेरी निन्दा करनेवाले हैं] और आप त्रिलोकीनाथ होकर भी लोकके अधीन हैं। किन्तु मुझे अपनी चिन्ता नहीं है, मैं तो प्रभुके सोचने हीं सूखा जाता हूँ [कि कहीं लोग यह न कहने लगें कि रामजी भी कलियुगमें अपना स्वभाव छोड़कर करुणारहित हो गये]।

प्रभुकी महत्ता और दयालुता

तौलौं लोभ लोलुप ललात लालची लवार, बार-बार लालचु धरनि-धन-धामको। तवलौं वियोग-रोग-सोग, भोग जातनाको जुग सम लागत जीवनु जाम-जामको॥ तौलौं दुख-दारिद दहत अति नित तनु तुलसी हैं किंकरु बिमोह-कोह-कामको। सब दुख आपने, निरापने सकल सुख, जौलौं जनु भयो न बजाइ राजा रामको ॥१२४॥

जबतक तुलसीदास राजा रामका खुल्लमखुल्ला दास नहीं हो जाता तभीतक वह लोभके कारण लोलुप, लालची और वाचाल बना हुआ टुकड़े-टुकड़ेके लिये लालायित रहता है; और पृथ्वी, धन एवं गृह आदिके लिये बार-बार ललचाता रहता है, तभीतक उसे वियोग और रोगका शोक रहता है, तभीतक उसे यातना भोगनी पड़ती है और तभीतक उसे पल-पलका जीवन युगके समान जान पड़ता है; तभीतक उसका शरीर दुःख और दरिद्रताके कारण सर्वदा अत्यन्त जलता रहता है और तभीतक वह मोह, क्रोध और कामका

उत्तरकाण्ड १८३ गुलाम है; और तभीतक सारे दुःख तो उसके हिस्सेमें हैं और सारे सुख दूसरोंके हैं। तौलौं मलीन, हीन, दीन, सुख सपनेँ न, जहाँ-तहाँ दुखी जनु भाजनु कलेसको। तौलौं उबेने पाय फिरत पेटौ खलाय बाय मुह सहत पराभौ देस-देसको॥ तवलौं दयावनो दुसह दुख दारिदको, साथरीको सोइवो, ओढ़िवो झूने खेसको। जवलौं न भजै जीहैं जानकीजीवन रामु, राजनको राजा सो तौ साहेबु महेसको ॥१२५॥ जो राजाओंके राजा और महेश्वरके भी ईश्वर हैं उन प्राणनाथका जबतक जिह्वासे भजन नहीं करता तभीतक जीव दीन हीन और मलिन रहता है, उसे स्वप्नमें भी सुख नहीं मिलता, और जहाँ-तहाँ वह दुखी मनुष्य क्लेशका पात्र होता है; तभीतक वह नंगे पैर पेट खलाये और मुँह बाये देश-देशका तिरस्कार सहन करता फिरता है तथा तभीतक उसे दरिद्रताका दयावह और दुःसह दुःख घास-फूसकी शय्यापर सोना और झीने खेसका ओढ़ना रहता है। ईसनके ईस, महाराजके महाराज, देवनके देव, देव ! प्रानहुके प्रान हौ। कालहूके काल, महाभूतनके महाभूत, कर्महूके करम, निदानके निदान हौ॥ निगमको अगम, सुगम तुलसीहू-सेको

कवितावली १८४ एते मान सीलसिंधु, करुनानिधान हौ। महिमा अपार, काहू बोल को न वारापार, बड़ी साहबीमें नाथ ! बड़े सावधान हौ ॥१२६॥ हे नाथ ! आप ब्रह्मा आदि ईश्वरोंके भी ईश्वर, महाराजोंके महाराज, देवोंके देव और प्राणोंके भी प्राण हैं; आप कालके भी काल, महाभूतोंके भी महाभूत, कर्मके भी कर्म और कारणके भी कारण हैं। किन्तु वेदके लिये अगम होनेपर भी आप तुलसीदास-जैसे साधारण पुरुषके लिये सुलभ हैं। इतने महान् होनेपर भी आप शीलके समुद्र और करुणाके भण्डार हैं। आपकी महिमा अपार है। आपकी किसी भी वाणी (वेद-पुराण आदि) का वारापार नहीं है। किन्तु इतना बड़ा प्रभुत्व रहते हुए भी आप बड़े ही सावधान हैं [इसीसे यदि कोई अत्यन्त तुच्छ प्राणी भी आपके अनन्य शरणागत हो जाता है तो आप उसकी पूरी-पूरी चिन्ता रखते हैं]। आरतपाल कृपालु जो रामु जेहीं सुमिरे तेहि को तहँ ठाढ़े। नाम-प्रताप-महामहिमा अँकरे किये खोटेउ, छोटेउ बाढ़े॥ सेवक एकतँ एक अनेक भए तुलसी तिहुँ ताप न डाढ़े। प्रेम बदौँ प्रहलादहिकों, जिन पाहनतें परमेस्वरु काढ़े ॥१२७॥ भगवान् राम दीन-दुखियोंके रक्षक एवं दयामय हैं। उनको जिसने जहाँ स्मरण किया उनके लिये वे वहीं खड़े हो जाते हैं। उनके नामके प्रभावकी बड़ी ही महिमा है, जिसने खोटोंको बहुमूल्य और छोटोंको बड़ा कर दिया। उनके एक-से-एक बढ़कर अनेकों सेवक हुए, जिनमेंसे कोई भी आध्यात्मिकादि त्रितापोंसे

१८९ उत्तरकाण्ड प्रसन्न नहीं हुए। परन्तु प्रेम तो मैं प्रह्लादका ही मानता हूँ जिसने पत्थरमेंसे भगवान्‌को प्रकट कर दिया । काढ़ि कृपान, कृपा न कहूँ, पितु काल कराल विलोकि न भागे। ‘राम कहाँ?’ ‘सब ठाउँ हैं’, ‘खंभमें ?’ ‘हाँ’ सुनि हाँक नृकेहरि जागे वैरि विदारि भए विकराल, कहैं प्रहलादहिकें अनुरागे। प्रीति-प्रतीति बढ़ी तुलसी, तबतें सब पाहन पूजन लागे ॥१२८॥ (हिरण्यकशिपुने प्रह्लादजीको मारनेके लिये) तलवार निकाल ली, उसके मनमें कहीं तनिक भी दया न थी; किन्तु कालके समान भयङ्कर पिताको देखकर भी प्रह्लादजी भागे नहीं। और जब उसने कहा - 'बता तेरा राम कहाँ है ?' तो बोले— 'सर्वत्र हैं।' इसपर उसने पूछा—'क्या इस खंभमें भी हैं।' तो प्रह्लादजीने कहा—'हाँ'। उनकी इस हाँकको सुनते ही नृसिंहजी प्रकट हो गये और शत्रुको नाश कर क्रोधवश बड़े भयङ्कर बन गये। फिर वे प्रह्लादजीके प्रार्थना करनेपर ही शान्त हुए। तुलसीदासजी कहते हैं—इससे भगवान्‌के प्रति लोगोंका प्रेम और विश्वास बढ़ गया और तभीसे लोग पाषाण (पाषाणमयी प्रतिमाओंका) पूजन करने लगे। अंतरजामिहुतें बड़े बाहेरजामि हैं रामु, जे नाम लियेतें। धावत धेनु पेन्हाइ लवाई ज्यौं बालक-बोलनि कान कियेतें ॥ आपनि बूझि कहै तुलसी, कहिवेकी न बावरि बात बियेतें। पैज परें प्रहलादहुको प्रगटे प्रभु पाहनतें, न हियेतें ॥१२९॥ बहिर्गत सगुणरूप भगवान् राम अन्तर्यामी निराकार ईश्वरसे भी बड़े हैं, क्योंकि जिस प्रकार हालकी व्यायी गौ अपने बच्चेका शब्द सुनते ही स्तनोंमें दूध उतार दौड़ी आती है उसी प्रकार वें

भी [अपना नाम सुनकर] दौड़े आते हैं। तुलसीदास तो अपनी समझकी बात कहता है, ऐसी दावकी बातें दूसरे लोगोंसे कहे जाने योग्य नहीं हुआ करतीं। प्रह्लादके प्रतिज्ञा करनेपर उनके लिये प्रभु पत्थरसे ही प्रकट हो गये, हृदयसे नहीं। बालकु बोलि दियो बलि कालको, कायर कोटि कुचालि चलाई। पापी है बाप, बड़े परितापनें आपनि ओरतें खोरि न लाई ॥ भूरि दईं बिषमूरि, भईं प्रहलाद-सुधाई सुधार्की मलाई। रामकृपाँ तुलसी जनको जग होत भलेको भलाई भलाई ॥१३०॥ कायर हिरण्यकशिपुने करोड़ों कुचालें कीं और बालक प्रह्लादको बुलाकर कालको बलि दिया। पिता हिरण्यकशिपु बड़ा ही पापी था, उस दुष्टने प्रह्लादजीको कष्ट देनेमें अपनी ओरसे कोई कसर नहीं रक्खी। उसने बहुत-सी विषमूलें दीं, किन्तु प्रह्लादजीकी साधुतासे वे अमृतकी मलाई बन गयीं। तुलसी- दासजी कहते हैं—भगवान् रामकी कृपासे संसारमें उनके साधु सेवककी सब प्रकार भलाई ही होती है। कंस करी बृजबासिन पै करतूति कुभाँति, चली न चलाई। पंडुके पूत सपूत, कपूत सुजोधन भो कलि छोटो छलाई ॥ कान्ह कृपाल बड़े नतपाल, गए खल खेचर खीस खलाई। ठीक प्रतीति कहै तुलसी, जग होइ भलेको भलाई मलाई ॥१३१॥ कंसने ब्रजवासियोंके प्रति बहुत बुरी तरहसे कुचाल की, परन्तु उसकी एक भी चाल न चली। पाण्डुके पुत्र युधिष्ठिरादि बड़े साधु थे; उनके लिये कुपूत दुर्योधन छलनेमें छोटे कलियुगके समान हो गया [अर्थात् उसने भी उन्हें छलकर पददलित-

१८७ उत्तरकाण्ड करनेमें कोई कसर नहीं छोड़ी; परन्तु कृपालु श्रीरामचन्द्र बड़े ही शरणागतरक्षक हैं, अतः अन्तमें दुःखोंके कारण वे दुष्ट बकासुर आदि राक्षस स्वयं नष्ट हो गये। तुलसीदास अपने सच्चे विश्वासकी बात कहता है कि संसारमें भक्तोंकी भलाई- ही-भलाई होती है। अवनीस अनेक भए अवनीं, जिनके डरतें सुर सोच सुखाहीं। मानव-दानव-देव सतावन रावन घाटि रच्यो जग माहीं ॥ ते मिलये धरि धूरि सुजोधनु, जे चलते बहु छत्रकी छाहीं। वेद-पुरान कहें, जगु जान, गुमान गोविंदहि भावन नाहीं ॥१३२॥ इस पृथ्वीपर ऐसे अनेकों राजा हो गये हैं जिनके भयके कारण देवता लोग चिन्तामें ही सूखे जाते थे। मनुष्य, राक्षस और देवताओंको सतानेके लिये एक रावण ही क्या संसारमें किसीसे कम रचा गया था ? वे सब और दुर्योधन भी जो कि अनेकों छत्रोंकी छायामें चलते थे, पृथ्वीकी धूलिमें मिल गये। वेद-पुराण कहते हैं और सारा संसार भी जानता है कि श्रीगोविन्दको अभिमान अच्छा नहीं लगता। गोपियोंका अनन्य प्रेम* जब नैनन प्रीति ठई ठग स्याम सों, स्यानी सखी हठि हौं बरजी। नहि जानो वियोगु-सो रोगु है आगे झुकी तब हौं तेहिसों तरजी ॥ अब देह भई पट नेहके घाले सों, ब्योंत करै विरहा-दरजी। ब्रजराजकुमार बिना सुनु भृंग ! अनंगु भयो जियको गरजी १३३

  • यहाँ प्रसङ्ग न होनेपर भी गोपियोंका अनन्य प्रेम प्रदर्शित करनेके लिये ही श्रीगोसाईंजीने आगेके कवित्त कहे हैं।

कवितावली १८८ [ श्रीकृष्णचन्द्रके मथुरा पधार जानेपर उनकी वियोग- व्यथासे पीड़ित कोई व्रजबाला योग सिखाने आये हुए भगवान्‌के प्रिय सखा उद्धवजीको भ्रमरके व्याजसे कहती है—] हे भ्रमर ! जिस समय मेरे नेत्रोंने इस ठगिया श्यामसुन्दरसे प्रीति जोड़ी थी उसी समय एक चतुर सखीने मुझे बलपूर्वक रोका था। किन्तु मैं नहीं जानती थी कि आगे इसमें वियोग-जैसा रोग निकलेगा; इसलिये उस समय मैं उसपर नाराज हुई और उसका तिरस्कार किया । अब नेह लगानेसे मेरी देह मानो वस्त्र हो गयी है, उसे विरहरूपी दर्जी ब्योंत रहा है और हे भृंग ! सुन, उस व्रजराजदुलारेके बिना काम मेरे जीका ग्राहक हो गया है। जोग-कथा पठई व्रजको, सब सो सठ चेरीकी चाल चलाकी । ऊधौ जू ! क्यों न करै कुबरी, जो बरी नटनागर हेरि हलाकी ॥ जाहि लगै परि जाने सोई, तुलसी सो सोहागिनि नंदउलाकी । जानी है जानपनी हरिकी, अब बाँधियैगी कठु मोटि कऊाकी १३४ हे उद्धवजी ! व्रजको जो यह योगका सन्देश भेजा गया है वह सब उस दुष्ट दासीकी चालाकीभरी चाल है । अब भला, कुबड़ी ऐसा क्यों न करेगी, जिसे घातक श्रीकृष्णने खोजकर वरण किया है । विरहकी आग कैसी होती है यह तो वही जान सकती है जिसे वह लगती है; आज कुब्जा तो नन्दनन्दनकी सुहागिन बनी हुई है [ उसे हमारी पीरका क्या पता ? ] किन्तु इससे हमें श्यामसुन्दरकी बुद्धिमानीका पता लग गया [ उन्हें कूबड़ बहुत पसंद है, इसलिये ] अब हम भी पीठपर बनावटी मोटरी बाँधा करेंगी [ जिससे कुबड़ी दिखायी दिया करें ] ।

१८९ उत्तरकाण्ड पठयो है छपदु छबीलै कान्ह कैहूँ कहूँ खोजि कै खवासु स्वामो कूबरी-सी बालको। ग्यानको गढ़ैया, बिनु गिराको पढ़ैया, बार- खारुको कढ़ैया, सो बढ़ैया उर-सालको॥ प्रीतिको बधिक, रस-रीतिको अधिक, नीति- निपुन, विवेकु है, निदेसु देस-कालको। तुलसी कहैं न बनै, सहैं ही बनैगी सब, जोगु भयो जोगको वियोगु नंदलालको ॥१३५॥ छबीले श्यामसुन्दरने कहाँसे जैसे-तैसे ढूँढ़कर कुबड़ी-जैसी बालाका यह भ्रमररूप बड़ा उत्तम सेवक भेजा है। यह बड़ी ज्ञानकी बातें गढ़नेवाला, बिना जिह्वाके ही बोलनेवाला, बालकी खाल खींचनेवाला और हृदयकी पीड़ाको बढ़ानेवाला है। यह प्रीतिका वध करनेवाला, विशेषतया रसरीतिको नष्ट करनेवाला और बड़ा नीतिकुशल एवं विवेकी है। सो इसमें इसका कोई दोष नहीं, देश-कालका ऐसा ही विधान है। तुलसीदासजी कहते हैं, अब कहनेसे कुछ प्रयोजन सिद्ध थोड़े ही होगा, अब तो सब कुछ सहना ही पड़ेगा; क्योंकि जब नन्दनन्दनसे वियोग हो गया तब योगके लिये अवसर आ ही गया। विनय हनूमान ! है कृपाल, लाडिले लखनलाल ! भावते भरत ! कीजै सेवक-सहाय जू । विनती करत दीन दूबरो दयावनो सो

कवितावली १३० विगरतैं आपु ही सुधारि लीजै भाय जू ॥ मेरी साहिबिनी सदा सीसपर बिलसति देवि क्यों न दासको देखाइयत पाय जू । खीझहूमैं रीझिबेकी बानि, सदा रीझत हैं, रीझे ह्वैहैं, रामकी दोहाई, रघुराय जू ॥ १३६ ॥ हे श्रीहनुमान्‌जी ! हे लड़िले लखनलाल ! हे मनभावन भरतजी ! तनिक कृपाकर इस सेवककी सहायता कीजिये। यह दीन, दुर्बल और दयापात्र दास आपसे विनय करता है; इससे यदि कोई भाव बिगड़ जाय तो आप ही सुधार लें। मेरी स्वामिनी सदा मेरे मस्तकपर विराजमान रहती हैं; सो हे देवि ! आप भी इस दासको अपने चरणोंका दर्शन क्यों नहीं करातीं ? हमारे प्रभुका तो खीझनेमें भी रीझनेका स्वभाव है; वे तो सदा ही प्रसन्न रहते हैं। अतः रामकी दुहाई, इस समय भी श्रीरघुनाथजी अवश्य रीझे होंगे। बेषु विरागको, राग भरो मनु, माय ! कहौं सतिभाव हौं तोसों । तेरे ही नाथको नामु लै वेचि हों पातकी पाँवर प्राननि पोसों ॥ एते बड़े अपराधी अघी कहूँ, तैं कहु, अंब ! कि मेरो तूँ, मोसों । स्वारथको परमारथको परिपूरन भो, फिरि घाटि न होसों ॥ माताजी ! मैं तुमसे ठीक-ठीक कहता हूँ, मेरा वेष तो वैराग्यका-सा है किन्तु मन रागसे भरा हुआ है। तुम्हारे ही स्वामी- का नाम बेचकर (अर्थात् रामके नामपर भीख माँगकर) मैं इन पापी पामर प्राणोंका पोषण करता हूँ। इतने बड़े अपराधी और पापीसे, हे मातः ! तू यह कह दे कि 'तू मेरा है और मुझसे

उत्तरकाण्ड १९१ उत्पन्न हुआ है।' इससे मेरा स्वार्थ और परमार्थ दोनों सिद्ध हो जायँगे; फिर मेरे अंदर किसी प्रकार की कमी नहीं रह जायगी। सीतावट-वर्णन जहाँ बालमीकि भए ब्याधतें मुनिंदु साधु 'मरा मरा' जपें सिख सुनि रिषि सातकी। सीयको निवास, लव-कुसको जनमथल तुलसी छुअत छाँह ताप गरै गातकी ॥ बिटपमहीप सुरसरित समीप सोहै, सीतावदु पेखत पुनीत होत पातकी। बारिपुर दिगपुर बीच बिलसति भूमि, अंकित जो जानकी-चरन-जलजातकी ॥१३८॥ जहाँ सप्तर्षियोंका उपदेश सुनकर (राममन्त्रको उलटे क्रमसे) 'मरा-मरा' जपते हुए वाल्मीकिजी व्याधसे महामुनि साधु हो गये, जो श्रीसीताजीका निवासस्थान और कुश तथा लवका जन्मस्थान था, तुलसीदासजी कहते हैं जहाँकी छायाका स्पर्श होते ही शरीरका सारा ताप शान्त हो जाता है, वह वृक्ष-राज सीतावट श्रीगङ्गाजीके तटपर शोभायमान है । उसके दर्शन- मात्रसे पापी पुरुष भी पवित्र हो जाता है। यह स्थान बारिपुर और दिगपुर इन दो गाँवोंके बीचमें है* और श्रीजानकीजीके चरणकमलोंसे अङ्कित है। मरकतबरन परन, फल मानिक-से लसै जटाजूट जनु रूखवेष हरु है।

  • यह स्थान प्रयाग और काशीके बीचमें सीतामढ़ी नामसे प्रसिद्ध है।