भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

उत्तरकाण्ड १८३ गुलाम है; और तभीतक सारे दुःख तो उसके हिस्सेमें हैं और सारे सुख दूसरोंके हैं। तौलौं मलीन, हीन, दीन, सुख सपनेँ न, जहाँ-तहाँ दुखी जनु भाजनु कलेसको। तौलौं उबेने पाय फिरत पेटौ खलाय बाय मुह सहत पराभौ देस-देसको॥ तवलौं दयावनो दुसह दुख दारिदको, साथरीको सोइवो, ओढ़िवो झूने खेसको। जवलौं न भजै जीहैं जानकीजीवन रामु, राजनको राजा सो तौ साहेबु महेसको ॥१२५॥ जो राजाओंके राजा और महेश्वरके भी ईश्वर हैं उन प्राणनाथका जबतक जिह्वासे भजन नहीं करता तभीतक जीव दीन हीन और मलिन रहता है, उसे स्वप्नमें भी सुख नहीं मिलता, और जहाँ-तहाँ वह दुखी मनुष्य क्लेशका पात्र होता है; तभीतक वह नंगे पैर पेट खलाये और मुँह बाये देश-देशका तिरस्कार सहन करता फिरता है तथा तभीतक उसे दरिद्रताका दयावह और दुःसह दुःख घास-फूसकी शय्यापर सोना और झीने खेसका ओढ़ना रहता है। ईसनके ईस, महाराजके महाराज, देवनके देव, देव ! प्रानहुके प्रान हौ। कालहूके काल, महाभूतनके महाभूत, कर्महूके करम, निदानके निदान हौ॥ निगमको अगम, सुगम तुलसीहू-सेको