कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 187, कुल 228 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १८४ एते मान सीलसिंधु, करुनानिधान हौ। महिमा अपार, काहू बोल को न वारापार, बड़ी साहबीमें नाथ ! बड़े सावधान हौ ॥१२६॥ हे नाथ ! आप ब्रह्मा आदि ईश्वरोंके भी ईश्वर, महाराजोंके महाराज, देवोंके देव और प्राणोंके भी प्राण हैं; आप कालके भी काल, महाभूतोंके भी महाभूत, कर्मके भी कर्म और कारणके भी कारण हैं। किन्तु वेदके लिये अगम होनेपर भी आप तुलसीदास-जैसे साधारण पुरुषके लिये सुलभ हैं। इतने महान् होनेपर भी आप शीलके समुद्र और करुणाके भण्डार हैं। आपकी महिमा अपार है। आपकी किसी भी वाणी (वेद-पुराण आदि) का वारापार नहीं है। किन्तु इतना बड़ा प्रभुत्व रहते हुए भी आप बड़े ही सावधान हैं [इसीसे यदि कोई अत्यन्त तुच्छ प्राणी भी आपके अनन्य शरणागत हो जाता है तो आप उसकी पूरी-पूरी चिन्ता रखते हैं]। आरतपाल कृपालु जो रामु जेहीं सुमिरे तेहि को तहँ ठाढ़े। नाम-प्रताप-महामहिमा अँकरे किये खोटेउ, छोटेउ बाढ़े॥ सेवक एकतँ एक अनेक भए तुलसी तिहुँ ताप न डाढ़े। प्रेम बदौँ प्रहलादहिकों, जिन पाहनतें परमेस्वरु काढ़े ॥१२७॥ भगवान् राम दीन-दुखियोंके रक्षक एवं दयामय हैं। उनको जिसने जहाँ स्मरण किया उनके लिये वे वहीं खड़े हो जाते हैं। उनके नामके प्रभावकी बड़ी ही महिमा है, जिसने खोटोंको बहुमूल्य और छोटोंको बड़ा कर दिया। उनके एक-से-एक बढ़कर अनेकों सेवक हुए, जिनमेंसे कोई भी आध्यात्मिकादि त्रितापोंसे