भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 188

१८९ उत्तरकाण्ड प्रसन्न नहीं हुए। परन्तु प्रेम तो मैं प्रह्लादका ही मानता हूँ जिसने पत्थरमेंसे भगवान्‌को प्रकट कर दिया । काढ़ि कृपान, कृपा न कहूँ, पितु काल कराल विलोकि न भागे। ‘राम कहाँ?’ ‘सब ठाउँ हैं’, ‘खंभमें ?’ ‘हाँ’ सुनि हाँक नृकेहरि जागे वैरि विदारि भए विकराल, कहैं प्रहलादहिकें अनुरागे। प्रीति-प्रतीति बढ़ी तुलसी, तबतें सब पाहन पूजन लागे ॥१२८॥ (हिरण्यकशिपुने प्रह्लादजीको मारनेके लिये) तलवार निकाल ली, उसके मनमें कहीं तनिक भी दया न थी; किन्तु कालके समान भयङ्कर पिताको देखकर भी प्रह्लादजी भागे नहीं। और जब उसने कहा - 'बता तेरा राम कहाँ है ?' तो बोले— 'सर्वत्र हैं।' इसपर उसने पूछा—'क्या इस खंभमें भी हैं।' तो प्रह्लादजीने कहा—'हाँ'। उनकी इस हाँकको सुनते ही नृसिंहजी प्रकट हो गये और शत्रुको नाश कर क्रोधवश बड़े भयङ्कर बन गये। फिर वे प्रह्लादजीके प्रार्थना करनेपर ही शान्त हुए। तुलसीदासजी कहते हैं—इससे भगवान्‌के प्रति लोगोंका प्रेम और विश्वास बढ़ गया और तभीसे लोग पाषाण (पाषाणमयी प्रतिमाओंका) पूजन करने लगे। अंतरजामिहुतें बड़े बाहेरजामि हैं रामु, जे नाम लियेतें। धावत धेनु पेन्हाइ लवाई ज्यौं बालक-बोलनि कान कियेतें ॥ आपनि बूझि कहै तुलसी, कहिवेकी न बावरि बात बियेतें। पैज परें प्रहलादहुको प्रगटे प्रभु पाहनतें, न हियेतें ॥१२९॥ बहिर्गत सगुणरूप भगवान् राम अन्तर्यामी निराकार ईश्वरसे भी बड़े हैं, क्योंकि जिस प्रकार हालकी व्यायी गौ अपने बच्चेका शब्द सुनते ही स्तनोंमें दूध उतार दौड़ी आती है उसी प्रकार वें

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