कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभी [अपना नाम सुनकर] दौड़े आते हैं। तुलसीदास तो अपनी समझकी बात कहता है, ऐसी दावकी बातें दूसरे लोगोंसे कहे जाने योग्य नहीं हुआ करतीं। प्रह्लादके प्रतिज्ञा करनेपर उनके लिये प्रभु पत्थरसे ही प्रकट हो गये, हृदयसे नहीं। बालकु बोलि दियो बलि कालको, कायर कोटि कुचालि चलाई। पापी है बाप, बड़े परितापनें आपनि ओरतें खोरि न लाई ॥ भूरि दईं बिषमूरि, भईं प्रहलाद-सुधाई सुधार्की मलाई। रामकृपाँ तुलसी जनको जग होत भलेको भलाई भलाई ॥१३०॥ कायर हिरण्यकशिपुने करोड़ों कुचालें कीं और बालक प्रह्लादको बुलाकर कालको बलि दिया। पिता हिरण्यकशिपु बड़ा ही पापी था, उस दुष्टने प्रह्लादजीको कष्ट देनेमें अपनी ओरसे कोई कसर नहीं रक्खी। उसने बहुत-सी विषमूलें दीं, किन्तु प्रह्लादजीकी साधुतासे वे अमृतकी मलाई बन गयीं। तुलसी- दासजी कहते हैं—भगवान् रामकी कृपासे संसारमें उनके साधु सेवककी सब प्रकार भलाई ही होती है। कंस करी बृजबासिन पै करतूति कुभाँति, चली न चलाई। पंडुके पूत सपूत, कपूत सुजोधन भो कलि छोटो छलाई ॥ कान्ह कृपाल बड़े नतपाल, गए खल खेचर खीस खलाई। ठीक प्रतीति कहै तुलसी, जग होइ भलेको भलाई मलाई ॥१३१॥ कंसने ब्रजवासियोंके प्रति बहुत बुरी तरहसे कुचाल की, परन्तु उसकी एक भी चाल न चली। पाण्डुके पुत्र युधिष्ठिरादि बड़े साधु थे; उनके लिये कुपूत दुर्योधन छलनेमें छोटे कलियुगके समान हो गया [अर्थात् उसने भी उन्हें छलकर पददलित-