भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 190

१८७ उत्तरकाण्ड करनेमें कोई कसर नहीं छोड़ी; परन्तु कृपालु श्रीरामचन्द्र बड़े ही शरणागतरक्षक हैं, अतः अन्तमें दुःखोंके कारण वे दुष्ट बकासुर आदि राक्षस स्वयं नष्ट हो गये। तुलसीदास अपने सच्चे विश्वासकी बात कहता है कि संसारमें भक्तोंकी भलाई- ही-भलाई होती है। अवनीस अनेक भए अवनीं, जिनके डरतें सुर सोच सुखाहीं। मानव-दानव-देव सतावन रावन घाटि रच्यो जग माहीं ॥ ते मिलये धरि धूरि सुजोधनु, जे चलते बहु छत्रकी छाहीं। वेद-पुरान कहें, जगु जान, गुमान गोविंदहि भावन नाहीं ॥१३२॥ इस पृथ्वीपर ऐसे अनेकों राजा हो गये हैं जिनके भयके कारण देवता लोग चिन्तामें ही सूखे जाते थे। मनुष्य, राक्षस और देवताओंको सतानेके लिये एक रावण ही क्या संसारमें किसीसे कम रचा गया था ? वे सब और दुर्योधन भी जो कि अनेकों छत्रोंकी छायामें चलते थे, पृथ्वीकी धूलिमें मिल गये। वेद-पुराण कहते हैं और सारा संसार भी जानता है कि श्रीगोविन्दको अभिमान अच्छा नहीं लगता। गोपियोंका अनन्य प्रेम* जब नैनन प्रीति ठई ठग स्याम सों, स्यानी सखी हठि हौं बरजी। नहि जानो वियोगु-सो रोगु है आगे झुकी तब हौं तेहिसों तरजी ॥ अब देह भई पट नेहके घाले सों, ब्योंत करै विरहा-दरजी। ब्रजराजकुमार बिना सुनु भृंग ! अनंगु भयो जियको गरजी १३३

  • यहाँ प्रसङ्ग न होनेपर भी गोपियोंका अनन्य प्रेम प्रदर्शित करनेके लिये ही श्रीगोसाईंजीने आगेके कवित्त कहे हैं।