कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १८८ [ श्रीकृष्णचन्द्रके मथुरा पधार जानेपर उनकी वियोग- व्यथासे पीड़ित कोई व्रजबाला योग सिखाने आये हुए भगवान्के प्रिय सखा उद्धवजीको भ्रमरके व्याजसे कहती है—] हे भ्रमर ! जिस समय मेरे नेत्रोंने इस ठगिया श्यामसुन्दरसे प्रीति जोड़ी थी उसी समय एक चतुर सखीने मुझे बलपूर्वक रोका था। किन्तु मैं नहीं जानती थी कि आगे इसमें वियोग-जैसा रोग निकलेगा; इसलिये उस समय मैं उसपर नाराज हुई और उसका तिरस्कार किया । अब नेह लगानेसे मेरी देह मानो वस्त्र हो गयी है, उसे विरहरूपी दर्जी ब्योंत रहा है और हे भृंग ! सुन, उस व्रजराजदुलारेके बिना काम मेरे जीका ग्राहक हो गया है। जोग-कथा पठई व्रजको, सब सो सठ चेरीकी चाल चलाकी । ऊधौ जू ! क्यों न करै कुबरी, जो बरी नटनागर हेरि हलाकी ॥ जाहि लगै परि जाने सोई, तुलसी सो सोहागिनि नंदउलाकी । जानी है जानपनी हरिकी, अब बाँधियैगी कठु मोटि कऊाकी १३४ हे उद्धवजी ! व्रजको जो यह योगका सन्देश भेजा गया है वह सब उस दुष्ट दासीकी चालाकीभरी चाल है । अब भला, कुबड़ी ऐसा क्यों न करेगी, जिसे घातक श्रीकृष्णने खोजकर वरण किया है । विरहकी आग कैसी होती है यह तो वही जान सकती है जिसे वह लगती है; आज कुब्जा तो नन्दनन्दनकी सुहागिन बनी हुई है [ उसे हमारी पीरका क्या पता ? ] किन्तु इससे हमें श्यामसुन्दरकी बुद्धिमानीका पता लग गया [ उन्हें कूबड़ बहुत पसंद है, इसलिये ] अब हम भी पीठपर बनावटी मोटरी बाँधा करेंगी [ जिससे कुबड़ी दिखायी दिया करें ] ।