कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८९ उत्तरकाण्ड पठयो है छपदु छबीलै कान्ह कैहूँ कहूँ खोजि कै खवासु स्वामो कूबरी-सी बालको। ग्यानको गढ़ैया, बिनु गिराको पढ़ैया, बार- खारुको कढ़ैया, सो बढ़ैया उर-सालको॥ प्रीतिको बधिक, रस-रीतिको अधिक, नीति- निपुन, विवेकु है, निदेसु देस-कालको। तुलसी कहैं न बनै, सहैं ही बनैगी सब, जोगु भयो जोगको वियोगु नंदलालको ॥१३५॥ छबीले श्यामसुन्दरने कहाँसे जैसे-तैसे ढूँढ़कर कुबड़ी-जैसी बालाका यह भ्रमररूप बड़ा उत्तम सेवक भेजा है। यह बड़ी ज्ञानकी बातें गढ़नेवाला, बिना जिह्वाके ही बोलनेवाला, बालकी खाल खींचनेवाला और हृदयकी पीड़ाको बढ़ानेवाला है। यह प्रीतिका वध करनेवाला, विशेषतया रसरीतिको नष्ट करनेवाला और बड़ा नीतिकुशल एवं विवेकी है। सो इसमें इसका कोई दोष नहीं, देश-कालका ऐसा ही विधान है। तुलसीदासजी कहते हैं, अब कहनेसे कुछ प्रयोजन सिद्ध थोड़े ही होगा, अब तो सब कुछ सहना ही पड़ेगा; क्योंकि जब नन्दनन्दनसे वियोग हो गया तब योगके लिये अवसर आ ही गया। विनय हनूमान ! है कृपाल, लाडिले लखनलाल ! भावते भरत ! कीजै सेवक-सहाय जू । विनती करत दीन दूबरो दयावनो सो