कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
१८९ उत्तरकाण्ड पठयो है छपदु छबीलै कान्ह कैहूँ कहूँ खोजि कै खवासु स्वामो कूबरी-सी बालको। ग्यानको गढ़ैया, बिनु गिराको पढ़ैया, बार- खारुको कढ़ैया, सो बढ़ैया उर-सालको॥ प्रीतिको बधिक, रस-रीतिको अधिक, नीति- निपुन, विवेकु है, निदेसु देस-कालको। तुलसी कहैं न बनै, सहैं ही बनैगी सब, जोगु भयो जोगको वियोगु नंदलालको ॥१३५॥ छबीले श्यामसुन्दरने कहाँसे जैसे-तैसे ढूँढ़कर कुबड़ी-जैसी बालाका यह भ्रमररूप बड़ा उत्तम सेवक भेजा है। यह बड़ी ज्ञानकी बातें गढ़नेवाला, बिना जिह्वाके ही बोलनेवाला, बालकी खाल खींचनेवाला और हृदयकी पीड़ाको बढ़ानेवाला है। यह प्रीतिका वध करनेवाला, विशेषतया रसरीतिको नष्ट करनेवाला और बड़ा नीतिकुशल एवं विवेकी है। सो इसमें इसका कोई दोष नहीं, देश-कालका ऐसा ही विधान है। तुलसीदासजी कहते हैं, अब कहनेसे कुछ प्रयोजन सिद्ध थोड़े ही होगा, अब तो सब कुछ सहना ही पड़ेगा; क्योंकि जब नन्दनन्दनसे वियोग हो गया तब योगके लिये अवसर आ ही गया। विनय हनूमान ! है कृपाल, लाडिले लखनलाल ! भावते भरत ! कीजै सेवक-सहाय जू । विनती करत दीन दूबरो दयावनो सो
कवितावली १३० विगरतैं आपु ही सुधारि लीजै भाय जू ॥ मेरी साहिबिनी सदा सीसपर बिलसति देवि क्यों न दासको देखाइयत पाय जू । खीझहूमैं रीझिबेकी बानि, सदा रीझत हैं, रीझे ह्वैहैं, रामकी दोहाई, रघुराय जू ॥ १३६ ॥ हे श्रीहनुमान्जी ! हे लड़िले लखनलाल ! हे मनभावन भरतजी ! तनिक कृपाकर इस सेवककी सहायता कीजिये। यह दीन, दुर्बल और दयापात्र दास आपसे विनय करता है; इससे यदि कोई भाव बिगड़ जाय तो आप ही सुधार लें। मेरी स्वामिनी सदा मेरे मस्तकपर विराजमान रहती हैं; सो हे देवि ! आप भी इस दासको अपने चरणोंका दर्शन क्यों नहीं करातीं ? हमारे प्रभुका तो खीझनेमें भी रीझनेका स्वभाव है; वे तो सदा ही प्रसन्न रहते हैं। अतः रामकी दुहाई, इस समय भी श्रीरघुनाथजी अवश्य रीझे होंगे। बेषु विरागको, राग भरो मनु, माय ! कहौं सतिभाव हौं तोसों । तेरे ही नाथको नामु लै वेचि हों पातकी पाँवर प्राननि पोसों ॥ एते बड़े अपराधी अघी कहूँ, तैं कहु, अंब ! कि मेरो तूँ, मोसों । स्वारथको परमारथको परिपूरन भो, फिरि घाटि न होसों ॥ माताजी ! मैं तुमसे ठीक-ठीक कहता हूँ, मेरा वेष तो वैराग्यका-सा है किन्तु मन रागसे भरा हुआ है। तुम्हारे ही स्वामी- का नाम बेचकर (अर्थात् रामके नामपर भीख माँगकर) मैं इन पापी पामर प्राणोंका पोषण करता हूँ। इतने बड़े अपराधी और पापीसे, हे मातः ! तू यह कह दे कि 'तू मेरा है और मुझसे
उत्तरकाण्ड १९१ उत्पन्न हुआ है।' इससे मेरा स्वार्थ और परमार्थ दोनों सिद्ध हो जायँगे; फिर मेरे अंदर किसी प्रकार की कमी नहीं रह जायगी। सीतावट-वर्णन जहाँ बालमीकि भए ब्याधतें मुनिंदु साधु 'मरा मरा' जपें सिख सुनि रिषि सातकी। सीयको निवास, लव-कुसको जनमथल तुलसी छुअत छाँह ताप गरै गातकी ॥ बिटपमहीप सुरसरित समीप सोहै, सीतावदु पेखत पुनीत होत पातकी। बारिपुर दिगपुर बीच बिलसति भूमि, अंकित जो जानकी-चरन-जलजातकी ॥१३८॥ जहाँ सप्तर्षियोंका उपदेश सुनकर (राममन्त्रको उलटे क्रमसे) 'मरा-मरा' जपते हुए वाल्मीकिजी व्याधसे महामुनि साधु हो गये, जो श्रीसीताजीका निवासस्थान और कुश तथा लवका जन्मस्थान था, तुलसीदासजी कहते हैं जहाँकी छायाका स्पर्श होते ही शरीरका सारा ताप शान्त हो जाता है, वह वृक्ष-राज सीतावट श्रीगङ्गाजीके तटपर शोभायमान है । उसके दर्शन- मात्रसे पापी पुरुष भी पवित्र हो जाता है। यह स्थान बारिपुर और दिगपुर इन दो गाँवोंके बीचमें है* और श्रीजानकीजीके चरणकमलोंसे अङ्कित है। मरकतबरन परन, फल मानिक-से लसै जटाजूट जनु रूखवेष हरु है।
- यह स्थान प्रयाग और काशीके बीचमें सीतामढ़ी नामसे प्रसिद्ध है।
कवितावली १९८ सुपमाको ढेरु कैधौं, सुकृत-सुमेरु कैधौं, संपदा सकल मुद-मंगलको घरु है॥ देत अभिमत जो समेत प्रीति सेइये प्रतीति मानि तुलसी, विचारि काको थरु है। सुरसरि निकट सुहावनी अवनि सोहै रामरवनीको बडु कलि कामतरु है ॥१३९॥ उसके पत्ते मरकतमणिके समान नीलवर्ण तथा फल माणिक्यके सदृश (हरे रंगके) हैं। अपनी जटाओंके कारण वह ऐसा शोभा देता है, मानो वृक्षरूपमें महादेवजी ही हों। वह मानो सुन्दरताका पुञ्ज है, अथवा सुकृतका सुमेरु है किंवा सब प्रकार- की सम्पत्ति, आनन्द और मंगलका घर है। यदि 'यह किसका स्थान है' [अर्थात् जानकीजीका निवासस्थल है] इसका विचार करके विश्वास और प्रीतिपूर्वक उसका सेवन किया जाय तो वह सब प्रकारके इच्छित फल देता है। वह सुन्दर भूमि श्रीगङ्गाजीके तटपर सुशोभित है; यह रामवल्लभा श्रीजानकीजीका वट कलियुगमें कल्पवृक्षके समान है। देवधुनि पास, मुनिबासु, श्रीनिवासु जहाँ, प्राकृतहूँ वट-बूट बसत पुरारि हैं। जोग-जप-जागको, बिरागको पुनीत पीठु रागिन पै सीठ उठि बाहरी निहारिहैं ॥ 'आयसु', 'आदेस', 'बाबू' भलो-भलो भावसिद्ध तुलसी विचारि जोगी कहत पुकारि हैं।
१९३ उत्तरकाण्ड रामभगतनको तौ कामतरुतें अधिक, सियबटु सेयें करतल फल चारि हैं ॥१४०॥ साधारण वटवृक्षमें भी श्रीमहादेवजीका निवास होता है, फिर इसके समीप तो गङ्गाजीका तट तथा मुनिवर वाल्मीकिजी- का आश्रम है, जहाँ श्रीसीताजीने निवास किया था [ अतः इसकी महिमाका तो वर्णन ही कौन कर सकता है ? ] यह योग, जप, यज्ञ और वैराग्यके लिये तो बड़ा पवित्र पीठ है; किन्तु रागी पुरुषोंको, जो इसे बाहरी दृष्टिसे देखेंगे, यह बड़ा रूखा जान पड़ता है । तुलसीदासजी कहते हैं कि यहाँके लोग विचारपूर्वक 'जो आज्ञा', 'आदेश', 'भैया' आदि शिष्ट शब्दोंका स्वभावसे ही प्रयोग करते हैं । यह सीतावट रामभक्तोंके लिये तो कल्पवृक्षसे भी अधिक है, क्योंकि इसका सेवन करनेसे [ अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष ] चारों फल करतलगत हो जाते हैं [ जब कि कल्पवृक्षसे अर्थ, धर्म और काम केवल तीन ही फल मिलते हैं ] । चित्रकूट-वर्णन जहाँ बनु पावनो, सुहावने बिहंग-मृग, देखि अति लागत अनंदु खेत-खूँट-सो । सीता-राम-लखन-निवासु, बासु मुनिनको, सिद्ध-साधु-साधक सबै बिबेक-बूट-सो ॥ झरना झरत झारि सीतल पुनीत बारि, मंदाकिनि मंजुल महेसजटाजूट सो । तुलसी जौं रामसों सनेहु साँचो चाहिये तौ सेइये सनेहसों बिचित्र चित्रकूट सो ॥१४१॥ क० १३—
कवितावली १९४ जहाँका वन अति पवित्र है, और पशु-पक्षी अत्यन्त सुहावने हैं तथा जिसे खेतके टुकड़ेके समान (हरा-भरा) देखकर बड़ा आनन्द होता है; जहाँ सीता, राम और लक्ष्मणका निवास था. जहाँ अनेकों मुनिजन रहते हैं तथा जो सिद्ध, साधु और साधकों- के लिये विवेकरूपी वृक्षके समान है; जहाँ सबा झरनोंसे अति शीतल और पवित्र जल झरता रहता है तथा मन्दाकिनी नदी श्रीमहादेवजीके जटाजूटके समान जान पड़ती है । तुलसीदासजी कहते हैं—यदि तुम्हें भगवान् रामके सच्चे स्नेहकी चाह है तो प्रेमपूर्वक अद्भुत चित्रकूटका सेवन करो । मोह-वन कलिमल-पल-पीन जानि जियँ साधु-गाइ-विप्रनके भयको नेवारिहै। दीन्ही है रजाइ राम, पाइ सो सहाइ लाल लखन समत्थ बीर हेरि हेरि मारिहै॥ मंदाकिनी मंजुल कमान असि, बान जहाँ धारि-धार धीर धरि सुकर सुधारिहै। चित्रकूट अचल अहेरि बैठ्यो घात मानो पातकके ब्रात घोर सावज सँघारिहै ॥१४२॥ मोहरूपी वनमें पापराशिरूप सावज (हिंस्र पशु) कलि- कल्मषरूप मांससे मोटे हो रहे हैं, ऐसा चित्तमें जानकर श्रीरघु- नाथजीने आज्ञा दी है; अतः समर्थ वीर लखनलालकी सहायता पा चित्रकूट अचल अहेरी होकर उनकी घातमें बैठे हुए हैं। वे उन्हें ढूँढ-ढूँढ़कर मारेंगे तथा इस प्रकार साधु, गौ और ब्राह्मणोंके भयको हटायेंगे । उसके लिये वे मन्दाकिनी-जैसी मनोहर कमान
१०९२ उत्तरकाण्ड नया उसके जलकी धारारूप बाणोंको अपने करकमलोंसे धैर्य- पूर्वक धारण करेंगे । लागि दवारि पहार ठर्हा, लहकी कपि लंक जथा खरखौंकी । चारु चुआ चहुँ ओर चलैं, लपटैं-झपटैं सो तमीचर तौंकी ॥ क्यौं कहि जात महासुषमा, उपमा तकि ताकत है कवि कौंकी । मानो लसी तुलसी हनुमान-हिएँ जगजीति जरायकी चौकी १४३ [ एक समय चित्रकूटमें दावाग्नि लगी; गोसाईंजी अब उसी- का वर्णन करते हैं—] इस समय चित्रकूटमें ठठकर दावानल लगी हुई है और इस प्रकार प्रज्वलित हो रही है जैसे हनुमान्- जी ने लङ्कामें आग लगायी थी । दावाग्निके तापसे तपकर सुन्दर पशु चारों ओरको इस तरह भागे जाते हैं जैसे लङ्कामें आगकी ज्वालाओंकी लपकसे त्राँसे हुए राक्षस लोग इधर-उधर भागे थे । उस समयकी महान् शोभाका वर्णन किस प्रकार किया जाय ? उसकी उपमाको विचारता हुआ कवि बड़ी देरसे ताकता रह गया है [ परन्तु उसे इसके अनुरूप कोई उपमा नहीं मिलती ] ऐसा जान पड़ता है मानो हनुमान्जीके वक्षःस्थलपर संसारको जीतनेका जड़ाऊ पदक ( तमगा ) सुशोभित हो । तीर्थराजसुषमा देव कहैं अपनी-अपना, अवलोकन तीरथराजु चलो रे । देखि मिटैं अपराध अगाध, निमज्जत साधु-समाजु मलो रे ॥ सोहै सितासितको मिलिबो, तुलसी हुलसै हिय हेरि हलोरे । मानो हरे तृन चारु चरैं बगरे सुरधेनुके धौल कलोरे ॥१४४॥ देवता लोग आपसमें कहते हैं—अरे ! तीर्थराज प्रयागका
कवितावली १९६ दर्शन करने चलो । उनके दर्शनमात्रसे बड़े-बड़े अपराध नष्ट हो जाते हैं; वहा अच्छे-अच्छे साधु स्नान किया करते हैं । तुलसीदासजी कहते हैं—वहाँ श्रीगङ्गा और यमुनाके शुक्ल एवं श्यामवर्ण जलका संगम बड़ा ही शोभायमान जान पड़ता है; उसकी तरङ्गोंको देखकर हृदय बड़ा हर्षित होता है; मानो इधर- उधर फैले हुए कामधेनुके शुक्लवर्ण मनोहर बछड़े हरी-हरी घास चर रहे हों । श्रीगङ्गा-माहात्म्य देवनदी कहँ जो जन जान किए मनसा, कुल कोटि उधारे । देखि चले झगरैं सुरनारि, सुरेस बनाइ बिमान सँवारे ॥ पूजाको साजु विरंचि रचैं तुलसी, जे महातम जाननिहारे । ओककी नींव परी हरिलोक बिलोकत गंग ! तरंग तिहारे ॥१४५॥ जिस मनुष्यने गङ्गास्नानके लिये मनमें जानेका विचारमात्र कर लिया उसके करोड़ों पीढ़ियोंका उद्धार हो गया । उसे चलता देखकर [ उसे वरण करनेके लिये ] देवाङ्गनाएँ आपसमें झगड़ने लगती हैं, देवराज इन्द्र उसके लिये विमान बनाकर सजाने लगते हैं; ब्रह्माजी, जो कि उसके माहात्म्यको जाननेवाले हैं, उसके पूजनकी सामग्री जुटाने लगते हैं और हे गङ्गाजी ! तुम्हारी तरङ्गोंका दर्शन होते ही विष्णुलोकमें ( उसके लिये ) घरकी नींव पड़ जाती है [ अर्थात् उसका विष्णुलोकमें जाना निश्चित हो जाता है ] । ब्रह्म जो ब्यापकु बेद कहैं, गम नाहिं गिरा गुन-ग्यान गुनीको । जो करता, भरता, हरता, सुर-साहेबु, साहेबु दीन-दुनीको ॥
१९७ उत्तरकाण्ड सोइ भयो द्रवरूप सही, जो है नाथु विरंचि महेस मुनी को । मानि प्रतीति सदा तुलसी जलु काहे न सेवत देवधुनीको ॥१४६॥ जिस परब्रह्म परमात्माको वेद सर्वव्यापी कहते हैं, जिसके गुण और ज्ञानकी थाह गुणीजन और शारदा भी नहीं पा सकते; जो संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाला, देवताओंका स्वामी तथा लोक-परलोकका प्रभु है; जो ब्रह्मा, शिव और मुनि- जनोंका भी स्वामी है, निश्चय वही जलरूप हो गया है । तुलसी- दासजी कहते हैं—अरे, विश्वास करके सर्वदा श्रीगङ्गाजलका ही सेवन क्यों नहीं करता ? बारि तिहारो निहारि मुरारि भएँ परसै पद पापु लहौंगो । ईसु ह्वै सीस धरौं पै डरौं, प्रभुकी समताँ बड़े दोष दहौंगो ॥ बरु बारहिं बार सरीर धरौं, रघुबीरको ह्वै तव तीर रहौंगो । भागीरथी ! बिनवौं कर जोरि, बहोरि न खोरि लगै सो कहौंगो १ ४७ हे गङ्गे ! तुम्हारे जलके दर्शनके प्रभावसे यदि मैं विष्णु हो गया तो अपने चरणोंसे तुम्हारा स्पर्श होनेके कारण मुझे पाप लगेगा [ क्योंकि तुम्हारा जन्म विष्णुभगवान्के चरणोंसे है, और यदि मैं भी विष्णु हो गया तो अपने चरणोंसे तुम्हारा स्पर्श होनेके कारण मुझे पापका भागी होना पड़ेगा ]; और यदि महादेव हो गया तो सिरपर धारण करनेसे मुझे डर है कि इस प्रकार अपने प्रभु भगवान् शङ्करकी समता करनेके बड़े भारी अपराधसे दुःख पाऊँगा । इसलिये, भले ही मुझे बारंबार शरीर धारण करना पड़े, मैं तो श्रीरघुनाथजीका दास होकर ही तुम्हारे तीरपर रहूँगा । हे भागीरथि ! मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ—मैं वही बात कहूँगा जिससे फिर दोष न लगे ।
कवितावली १९८ अन्नपूर्णा-माहात्म्य लालची ललात, बिललात द्वार-द्वार दीन, बदन मलीन, मन मिटै ना बिसूरना। ताकत सराध, कै विवाह, कै उछाह कछु, डोलै लोल, बूझत सबद ढोल-तूरना ॥ प्यासेहूँ न पावै वारि, भूखें न चनक चारि, चाहत अहारन पहार, दारि घूर ना। सोकको अगार, दुखभार भरो तौलौं जन जौलौं देवी द्रवै न भवानी अन्नपूरना ॥१४८॥ जबतक देवी अन्नपूर्णा कृपा नहीं करतीं तभीतक मनुष्य लालची होकर (टुकड़े-टुकड़ेके लिये) लालायित होता है और दीन और मलिनमुख हो द्वार-द्वारपर बिलबिलाता रहता है, परन्तु उसके मनकी चिन्ता दूर नहीं होती; कहीं श्राद्ध अथवा विवाह अथवा कोई उत्सव तो नहीं, इस बातकी टोहमें रहता है, चञ्चल होकर इधर-उधर घूमता है और यदि कहीं ढोल या तुरहीका शब्द होता है तो पूछता है [ कि यहाँ कोई उत्सव तो नहीं है ? ] । प्यास लगनेपर उसे जल नहीं मिलता, भूख होनेपर चार चने भी नहीं मिलते, पहाड़के समान भोजनकी इच्छा होती है, परन्तु घूरेपर पड़ी दाल भी नहीं मिलती। इस प्रकार वह शोकका आश्रयस्थान और दुःखके भारसे दबा रहता है। शङ्कर-स्तवन भस्म अंग, मर्दन अनंग, संतत असंग हर। सीस गंग, गिरिजा अर्धंग, भूषन भुजंगबर ॥
१८९ उत्तरकाण्ड मुंडमाल, बिधु बाल भाल, डमरू कपालु कर । बिबुधवृंद-नवकुमुद-चंद, सुखकंद सूलधर ॥ त्रिपुरारि त्रिलोचन, दिग्वसन, बिषभोजन, भवभयहरन । कह तुलसिदासु सेवत सुलभ सिव सिव सिव संकर सरन॥१४९॥ श्रीमहादेवजी शरीरमें भस्म रमाये रहते हैं, वे कामदेवका दलन करनेवाले और सर्वदा असंग हैं। उनके सिरपर श्रीगङ्गाजी हैं, अर्धाङ्गमें पार्वतीजी हैं तथा अच्छे-अच्छे सर्प ही उनके आभूषण हैं। उनके गलेमें मुण्डमाला है, मस्तकपर द्वितीयाका चन्द्रमा है तथा हाथोंमें डमरू और कपाल सुशोभित हैं। देवताओंके समाजरूपी नवीन कुमुद-कुसुमके लिये शूलधारी भगवान् शङ्कर साक्षात् चन्द्रमा हैं। वे सुखकी जड़, त्रिपुर दैत्यके शत्रु, तीन नेत्रोंवाले, दिगम्बर, विषभोजी एवं संसारका भय निवृत्त करनेवाले श्रीमहादेवजी भजन किये जानेपर बड़ी सुगमतासे प्राप्त हो जाते हैं; मैं उन श्रीशिवशङ्करकी शरण हूँ। गरल-असन दिगबसन ब्यसनभंजन जनरंजन । कुंद-इंदु-कर्पूर-गौर सच्चिदानंदघन ॥ बिकटबेष, उर सेष, सीस सुरसरित सहज सुचि । सिव अकाम अभिरामधाम नित रामनाम रुचि ॥ कंदर्पदपं दुगम दमन उमारमन गुनभवन हर । त्रिपुरारि ! त्रिलोचन ! त्रिगुनपर ! त्रिपुरमथन ! जय त्रिदसबर ॥ जो विष भक्षण करनेवाले, दिगम्बर, दुःखहारी, भक्तमन- रञ्जन, कुन्द, चन्द्र एवं कर्पूरके समान गौरवर्ण, सच्चिदानन्दघन और विकट वेषधारी हैं; जिनके हृदयपर शेषजी और मस्तकपर
कवितावली २०० स्वभावसे ही परम पवित्र श्रीगङ्गाजी विराजमान हैं, जो कल्याण- स्वरूप, कामना-शून्य और सौन्दर्यधाम हैं तथा जिनकी रामनाममें नित्य रुचि है, कामदेवके दुर्गम दर्पका दमन करनेवाले उन उमारमण गुणमन्दिर पापापहारी त्रिपुरारि त्रिनयन त्रिगुणातीत त्रिपुरविदारण देवेश्वरकी जय हो, जय हो । अरध अंग अंगना, नाम जोगीस, जोगपति । विषम-असन, दिगवसन, नाम विस्वेसु, विस्वगति ॥ कर कपाल, सिर माल ब्याल, विष-भूति-विभूषन । नाम सुद्ध, अविरुद्ध, अमर, अनवद्य, अनूपन ॥ बिकराल-भूत-बेताल-प्रिय भीम नाम, भवभयदमन । सब बिधि समर्थ, महिमा अकथ, तुलसिदास-संसय-समन ॥ अहो ! जिनके अर्द्धाङ्गमें पार्वतीजी रहती हैं, परन्तु जिनका नाम योगीश्वर अथवा योगपति है, जिनका भाँग-धतूरा आदि विषम भोजन तथा दिशाएँ ही वस्त्र हैं, किन्तु जो विश्वेश्वर और विश्वके आश्रयस्थान कहलाते हैं; जिनके हाथमें कपाल, सिरपर सर्पोंकी माला और शरीरमें हालाहल विष और भस्मकी ही शोभा है, किन्तु जिनका नाम शुद्ध, अविरुद्ध, अमर, अमल और निर्दोष है; जिनका विकराल-भूत-वेताल-प्रिय ऐसा भयङ्कर नाम है किन्तु जो भव-भयका नाश करनेवाले हैं, तुलसीदासजी कहते हैं—वे महादेवजी सब प्रकार समर्थ हैं, उनकी महिमा अकथनीय है और वे मेरे सन्देहोंकी निवृत्ति करनेवाले हैं । भूतनाथ मयहरन भीम मयभवन भूमिधर । भानुमंत भगवंत भूतिभूषन भुजंगबर ॥
२०१ उत्तरकाण्ड भव्य भाववल्लभ मवेस भव-भार-विभंजन। भूरिभोग भैरव कुजोगगंजन जनरंजन॥ भारती-बदन विप-अदन सिव ससि-पतंग-पावक-नयन। कह तुलसिदास किन भजसि मन भद्रसदन मर्दनमयन ॥१५२॥ जो भूतोंके स्वामी, सब प्रकारके भय दूर करनेवाले, भयंकर भयके आश्रयस्थान, भूमिको धारण करनेवाले, तेजोमय, ऐश्वर्य- वान्, भस्म और सर्परूप आभूषण धारण करनेवाले, कल्याण- स्वरूप, भावप्रिय, संसारके स्वामी और संसारके भारको नष्ट करने- वाले हैं; जो महान् भोगशाली, भीषण, कुयोगका नाश करनेवाले, भक्तोंको आनन्दित करनेवाले, सरस्वतीरूप मुखवाले, विषभोजी, कल्याणस्वरूप, चन्द्रमा, सूर्य और अग्निरूप नेत्रोंवाले तथा कल्याणधाम और कामदेवका नाश करनेवाले हैं; तुलसीदास कहते हैं—हे मन ! तू उनका भजन क्यों नहीं करता ? नागो फिरै कहै मागनौ देखि ‘न खाँगो कछू’, जनि मागिये थोरो। राँकनि नाकप रीझि करै तुलसी जग जो जुरै जाचक जोरो ॥ नाक सँवारत आयो हाँ नाकहि, नाहिं पिनाकिहि नेकु निहोरो। ब्रह्मा कहैं, गिरिजा ! सिखवो पति रावरो, दानि है बावरो भोरो ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—हे पार्वती ! तुम अपने पतिको समझा दो—यह बड़ा बावला और भोला दानी है। देखो स्वयं तो नंगा फिरता है; परन्तु यदि किसी याचकको देखता है तो कहता है कि थोड़ा मत माँगना, यहाँ कुछ कमी नहीं है। संसारमें जितने याचक जोड़े जुट सकते उन्हें जुटाकर उन सब कँगालोंको प्रसन्न होकर इन्द्र बना देता है। उनके लिये स्वर्ग तैयार करते-करते
कवितावली २०२
मेरा नाकमें दम आ गया है, परन्तु पिनाकी (पिनाकपाणि महादेव) मेरा कुछ भी अहसान नहीं मानते। विषु पावकु ब्याल कराल गरैं, सरनागत तौ तिहुँताप न डाढ़े। भूत-बेताल सखा, भव नामु, दलै पलमें भवके भय गाढ़े॥ तुलसीसु दरिद्रसिरोमनि, सो सुमिरें दुख-दारिद्र होहिं न ठाढ़े। भौनमें भाँग, धतूरोई आँगन, नागेके आगें हैं मागने बाढ़े॥१५४॥ यह स्वयं तो गलेमें भयङ्कर विष और भीषण सर्प तथा [नेत्रोंमें] अग्नि धारण किये हुए है किन्तु इसके शरणागत तीनों तापोंसे दग्ध नहीं होते। इसके साथी तो भूत-वेतालादि हैं और नाम भी 'भव' है परन्तु यह भव (संसार) के भारी भयोंको पलभरमें नष्ट कर देता है। यह तुलसीका स्वामी (महादेव) हैं तो दरिद्रशिरोमणि-सा, किन्तु इसका स्मरण करनेपर दुःख और दारिद्र्य ठहरने नहीं पाते। इसके घरमें केवल भाँग है और आँगनमें केवल धतूरा; परन्तु इस नंगेके आगे माँगनेवाले निरन्तर बढ़ते ही रहते हैं। सीस बसै बरदा, वरदानि, चढ़यो बरदा, घरन्यो बरदा है। घाम धतूरो, बिभूतिको रूरो, निवासु जहाँ सब लै मरे दाहैं॥ ब्याली कपाली है ख्याली, चहूँ दिसि भाँगकी टाटिनके परदा हैं। राँक सिरोमनि काकिनिभाग बिलोकत लोकप को करदा है १५५ इसके मस्तकपर वरदायिनी गङ्गाजी विराजती हैं, स्वयं भी वरदायक अथवा श्रेष्ठ दानी है, बरदा (बैल) पर ही चढ़ा हुआ है और इसकी गृहिणी भी वरदायिनी पार्वती हैं। इसके घरमें धतूरा और भस्मका ही ढेर है तथा इसका निवासस्थान वहाँ है जहाँ सब लोग मुदोंको ले जाकर जलाते हैं। यह सर्प और कपाल धार-
२०३ उत्तरकाण्ड करनेवाला बड़ा कौतुकी है; उसके घरमें चारों ओर भाँगकी टट्टियोंके परदे लगे हुए हैं। वह आधी दमड़ीकी हैसियतवाले कंगालोंके शिरोमणिको भी लोकपाल बना देता है। दानि जो चारि पदारथको, त्रिपुरारि, तिहूँ पुरमें सिरटीको । भोरो भलो, भले भायको भूखो, भलोइ कियो सुमिरें तुलसीको ॥ ता बिनु आसको दास भयो, कबहुँ न मिट्यो लघु लालचु जीको । माधो कहा करि साधन तें, जो पै राध्यो नहीं पति पारवतीको ॥ जो अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—इन चारों पदार्थोंका दाता है, त्रिपुरासुरका वध करनेवाला और तीनों लोकोंमें सबका सिरमौर बना हुआ है, जो बड़ा भोला है, केवल शुद्ध भावका भूखा है तथा स्मरण करनेपर जिसने तुलसीदासका भी भला ही किया है, उसको छोड़कर तू विषयोंकी आशाका दास बना हुआ है, किन्तु तुम्हारे जीका तुच्छ लोभ कभी नष्ट नहीं हुआ। तुलसीदास कहते हैं— यदि तूने पार्वतीपति भगवान् शङ्करकी आराधना नहीं की तो बहुत-से साधन करके भी क्या फल पाया ? जात जरे सब लोक बिलोकि तिलोचन सो विषु लोकि लियो है । पान कियो विषु, भूषन भो, करुनाबरुनालय साँइँ-हियो है ॥ मेरोइ फोरिबे जोगु कपारु, किधों कछु काहूँ लखाइ दियो है । काहे न कान करो बिनती तुलसी कलिकाल बेहाल कियो है ॥ सम्पूर्ण लोक जले जा रहे हैं यह देखकर त्रिनयन भगवान् शङ्करने उस हालाहल विषको लपककर लिया और शीघ्रतासे पी लिया। इससे वह विष आपका आभूषण हो गया। हे स्वामी! आपका हृदय तो करुणाका समुद्र है। मालूम नहीं, मेरा भाग्य ही
कवितावली ३०४ छोड़ने योग्य है अथवा आपहीको किसीने मेरा कोई दोष दिखा दिया है। हे शङ्कर ! इस तुलसीको कलिकालने व्याकुल कर दिया है; आप इसकी प्रार्थनापर ध्यान क्यों नहीं देते ? खायो कालकूट, भयो अजर अमर तनु, भवनु मसानु, गथ गाठरी गरदकी। डमरू कपालु कर, भूषन कराल ब्याल, बावरे बड़ेकी रीझ वाहन बरदकी ॥ तुलसी विसाल गोरे गात बिलसति भूति, मानो हिमगिरि चारु चाँदनी सरदकी। अर्थ-धर्म-काम-मोच्छ बसत विलोकनिमें कासी करामाति जोगी जागति मरदकी ॥१५८॥ (महादेवजीने) कालकूट विष खाया था, किन्तु उनका शरीर अजर-अमर हो गया। अब श्मशान ही उनका निवासस्थान है और भस्मकी पोटली ही उनकी सम्पत्ति है। हाथमें डमरू और कपाल हैं, भयंकर सर्प ही उनके आभूषण हैं तथा उस अत्यन्त बावले महादेवकी बैलकी सवारीपर ही बड़ी रीझ (रुचि) है। तुलसीदासजी कहते हैं—उसके अति विशाल गौर शरीरपर विभूति सुशोभित है। सो ऐसी जान पड़ती है मानो हिमालय पर्वतपर शरत्कालीन चन्द्रिका छिटक रही हो। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—ये तो उसकी दृष्टिमें ही विराजते हैं, उस मर्द योगीकी करामात काशीमें प्रकट हो रही है। पिंगल जटाकलापु माथैपै पुनीत आपु, पावक नैना प्रताप अपार बरत हैं।
२७५ उत्तरकाण्ड
लोयन बिसाल लाल, सोहैं बालचंद्र भाल कंठ कालकूट, ब्याल-भूषन धरत हैं ॥ सुंदर दिगंबर, बिभूति गात, माँग खात, रूरै सृंगी पूरें काल-कंटक हरत हैं । देत न अघात रीझि, जात पात आकहीकें भोलानाथ जोगी जब औढर ढरत हैं ॥१५९॥
उनका जटाजूट पिंगलवर्ण है, मस्तकपर परमपवित्र गङ्गा- जल सुशोभित है । तथा उनके नेत्रस्थित अग्निकी ज्योति उनकी भौंहोंपर दमकती है । उनके नेत्र विशाल और अरुणवर्ण हैं, ललाटपर द्वितीयाका चन्द्र शोभायमान है, गलेमें कालकूट विष है, तथा वे सर्पोंके आभूषण धारण किये हुए हैं । उनका अति सुन्दर दिगम्बर वेष है और वे शरीरमें भस्म रमाये रहते हैं, भाँग खाते हैं तथा सींगका मनोहर शब्द करके कालरूपी कण्टकको निवृत्त कर देते हैं । जिस समय वे भोलानाथ योगी बेतरह प्रसन्न होते हैं उस समय वे देते-देते अघाते नहीं और स्वयं आकके पत्तोंसे ही रीझ जाते हैं ।
देत संपदासमेत श्रीनिकेत जाचकनि, भवन बिभूति-भाँग, वृषभ बहनु है । नाम बामदेव दाहिनो सदा असंग रंग अर्द्ध अंग अंगना, अनंगको महनु है ॥ तुलसी महेसको प्रभाव भावहीँ सुगम निगम-अगमहूको जानिबो गहनु है ।
कवितावली २०६ भेष नौ भिखारिको भयंकररूप संकर दयाल दीनबंधु दानि दारिददहनु है ॥१६०॥ जो माँगनेवालोंको सम्पत्तिसहित श्रीसम्पन्न अथवा लक्ष्मीजीका भवन अर्थात् वैकुण्ठ, भवन देते हैं; किन्तु जिनके घरमें केवल विभूति (भस्म) और भाँग है और चढ़नेके लिये जिनके बैलकी सवारी है, जिनका नाम तो 'वामदेव' है, किन्तु जो सर्वदा सबको दाहिने (अनुकूल) रहते हैं, सदा असंग (निर्लेपता का ठाट रहनेपर भी जिनके अर्धाङ्गमें पार्वतीजी रहती हैं तथा जो कामदेवका मथन करनेवाले हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—उन श्रीमहादेवजीका प्रभाव मात्र (भक्ति) से ही सुलभ है, नहीं तो वेद-शास्त्रके लिये भी उसका जानना अत्यन्त कठिन है। उनका वेष तो भिक्षुकोंका-सा है तथा रूप भी बड़ा भयानक है, किन्तु वे शङ्कर (कल्याण करनेवाले), दीनबन्धु, दयामय, दानिशिरोमणि तथा दारिद्र्यका नाश करनेवाले हैं। चाहै न अनंग-अरि एकौ अंग मागनेको देवोई पै जानिये, सुभावसिद्ध बानि सो। वारि बूंद चारि त्रिपुरारिपर डारिये तौं देत फल चारि, लेत सेवा सांची मानि सो॥ तुलसी भरोसो न भवेस भोरानाथको तौ कोटिक कलेस करौ, मरौ छार छानि सो। दारिद दमन दुख-दोष दाह दावानल दुनी न दयाल दूजो दानि सूलपानि-सो ॥१६१॥ मदनमथन भगवान् शङ्कर माँगनेवालेसे [षोडशोपचारमेंसे]
२०७ उत्तरकाण्ड किसी भी अंगकी इच्छा नहीं करते; वे तो केवल देना ही जानते हैं, यह उनकी स्वभावसिद्ध आदत है, यदि उनपर पानीकी चार बूँदें भी डाल दी जायें तो उसे ही वे सच्ची सेवा मान लेते हैं और उसके बदलेमें चारों फल दे डालते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—यदि तुम्हें विश्वेश्वर भगवान् भोलानाथका भरोसा नहीं है तो भले ही करोड़ों क्लेश करो और खाक छान-छानकर मर जाओ [ पल्ले कुछ पड़नेका नहीं ]; संसारमें शूलपाणि श्रीमहादेवजीके समान दारिद्रयको दूर करनेवाला तथा दुःख और दोषादिका दहन करनेके लिये दावानलरूप कोई दूसरा दयालु दानी नहीं है। काहेको अनेक देव सेवत जागै मसान, खोवत अपान, सठ ! होत हठि प्रेत रे। काहेको उपाय कोटि करत, मरत धाय, जाचत नरेस देस-देसके, अचेत रे ॥ तुलसी प्रतीति बिनु त्यागै तैं प्रयाग तनु, धनहीके हेत दान देत कुरुखेत रे। पात द्वै धतूरेके दै, भोरै कै, भवेससों, सुरेसहूकी संपदा सुभायसों न लेत रे ॥१६२॥ अरे अनेक देवताओंकी उपासनामें लगा रहकर मशान क्यों जगाता है ? अरे मूर्ख ! इस प्रकार तू अपनी प्रतिष्ठा खोकर आग्रहपूर्वक प्रेत क्यों बनता है ? अरे अज्ञानी ! तू करोड़ों उपाय करके दौड़-दौड़कर क्यों मरता है ? तथा देश-देशके राजाओंसे क्यों याचना करता फिरता है ? तुलसीदासजी कहते हैं-बिना विश्वासके ही तू प्रयागमें देहत्याग करता है। तथा धनके लिये
कवितावली २७८ ही तू कुरुक्षेत्रमें दान देता है ! [ उससे भी तुझ क्या लाभ होगा ? अरे ! भवनाथको दो धतूरेके पत्ते देकर और इस प्रकार उन्हें भुलावा देकर उनसे सहजहीमें इन्द्रकी सम्पत्ति क्यों नहीं ले लेता ? स्यंदन, गयंद, बाजिराजि, भले, भले, भट, धन-धाम-निकर करनिहूँ न पूजै क्वै । बनिता विनीत, पूत पावन सोहावन, औ विनय, विवेक, विद्या सुभग सरीर ज्वै ॥ इहाँ ऐसो सुख, परलोक सिवलोक ओक, जाको फल तुलसी सो सुनौ सावधान है। जानें, बिनु जानें, कै रिसानें, केलि कबहुँक सिवहि चढ़ाए हैंहैं बेलके पतौवा द्वै ॥१६३॥ जिसके यहाँ रथ, हाथी और घोड़ोंकी कतारें लगी हुई हैं, अच्छे-अच्छे योद्धा तथा धन-धामकी भी अधिकता है और जिसकी करनीको भी कोई नहीं पहुँच सकता; जिसकी स्त्री अत्यन्त विनीत, पुत्र बड़ा सदाचारी और सुन्दर तथा जिसे विनय, विवेक, विद्या और सुन्दर शरीर प्राप्त है । तुलसीदासजी कहते हैं—इस प्रकार उसे जो यहाँ ऐसा सुख प्राप्त है और परलोकमें शिवलोकमें स्थान मिलता है, यह सब फल जिस कर्मका है उसे सावधान होकर सुनो—उसने जानकर, बिना जाने, रूठकर अथवा खेलमें ही किसी समय श्रीमहादेवजीपर बेलके दो पत्ते चढ़ा दिये होंगे । रति-सी रवनि, सिंधुमेखला अवनि पति औनिप अनेक ठाढ़े हाथ जोरि हारि कै । संपदा-समाज देखि लाज सुरराजहूकें