भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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कवितावली २०२

मेरा नाकमें दम आ गया है, परन्तु पिनाकी (पिनाकपाणि महादेव) मेरा कुछ भी अहसान नहीं मानते। विषु पावकु ब्याल कराल गरैं, सरनागत तौ तिहुँताप न डाढ़े। भूत-बेताल सखा, भव नामु, दलै पलमें भवके भय गाढ़े॥ तुलसीसु दरिद्रसिरोमनि, सो सुमिरें दुख-दारिद्र होहिं न ठाढ़े। भौनमें भाँग, धतूरोई आँगन, नागेके आगें हैं मागने बाढ़े॥१५४॥ यह स्वयं तो गलेमें भयङ्कर विष और भीषण सर्प तथा [नेत्रोंमें] अग्नि धारण किये हुए है किन्तु इसके शरणागत तीनों तापोंसे दग्ध नहीं होते। इसके साथी तो भूत-वेतालादि हैं और नाम भी 'भव' है परन्तु यह भव (संसार) के भारी भयोंको पलभरमें नष्ट कर देता है। यह तुलसीका स्वामी (महादेव) हैं तो दरिद्रशिरोमणि-सा, किन्तु इसका स्मरण करनेपर दुःख और दारिद्र्य ठहरने नहीं पाते। इसके घरमें केवल भाँग है और आँगनमें केवल धतूरा; परन्तु इस नंगेके आगे माँगनेवाले निरन्तर बढ़ते ही रहते हैं। सीस बसै बरदा, वरदानि, चढ़यो बरदा, घरन्यो बरदा है। घाम धतूरो, बिभूतिको रूरो, निवासु जहाँ सब लै मरे दाहैं॥ ब्याली कपाली है ख्याली, चहूँ दिसि भाँगकी टाटिनके परदा हैं। राँक सिरोमनि काकिनिभाग बिलोकत लोकप को करदा है १५५ इसके मस्तकपर वरदायिनी गङ्गाजी विराजती हैं, स्वयं भी वरदायक अथवा श्रेष्ठ दानी है, बरदा (बैल) पर ही चढ़ा हुआ है और इसकी गृहिणी भी वरदायिनी पार्वती हैं। इसके घरमें धतूरा और भस्मका ही ढेर है तथा इसका निवासस्थान वहाँ है जहाँ सब लोग मुदोंको ले जाकर जलाते हैं। यह सर्प और कपाल धार-

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