भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 228 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 204

२०१ उत्तरकाण्ड भव्य भाववल्लभ मवेस भव-भार-विभंजन। भूरिभोग भैरव कुजोगगंजन जनरंजन॥ भारती-बदन विप-अदन सिव ससि-पतंग-पावक-नयन। कह तुलसिदास किन भजसि मन भद्रसदन मर्दनमयन ॥१५२॥ जो भूतोंके स्वामी, सब प्रकारके भय दूर करनेवाले, भयंकर भयके आश्रयस्थान, भूमिको धारण करनेवाले, तेजोमय, ऐश्वर्य- वान्, भस्म और सर्परूप आभूषण धारण करनेवाले, कल्याण- स्वरूप, भावप्रिय, संसारके स्वामी और संसारके भारको नष्ट करने- वाले हैं; जो महान् भोगशाली, भीषण, कुयोगका नाश करनेवाले, भक्तोंको आनन्दित करनेवाले, सरस्वतीरूप मुखवाले, विषभोजी, कल्याणस्वरूप, चन्द्रमा, सूर्य और अग्निरूप नेत्रोंवाले तथा कल्याणधाम और कामदेवका नाश करनेवाले हैं; तुलसीदास कहते हैं—हे मन ! तू उनका भजन क्यों नहीं करता ? नागो फिरै कहै मागनौ देखि ‘न खाँगो कछू’, जनि मागिये थोरो। राँकनि नाकप रीझि करै तुलसी जग जो जुरै जाचक जोरो ॥ नाक सँवारत आयो हाँ नाकहि, नाहिं पिनाकिहि नेकु निहोरो। ब्रह्मा कहैं, गिरिजा ! सिखवो पति रावरो, दानि है बावरो भोरो ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—हे पार्वती ! तुम अपने पतिको समझा दो—यह बड़ा बावला और भोला दानी है। देखो स्वयं तो नंगा फिरता है; परन्तु यदि किसी याचकको देखता है तो कहता है कि थोड़ा मत माँगना, यहाँ कुछ कमी नहीं है। संसारमें जितने याचक जोड़े जुट सकते उन्हें जुटाकर उन सब कँगालोंको प्रसन्न होकर इन्द्र बना देता है। उनके लिये स्वर्ग तैयार करते-करते