भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 206

२०३ उत्तरकाण्ड करनेवाला बड़ा कौतुकी है; उसके घरमें चारों ओर भाँगकी टट्टियोंके परदे लगे हुए हैं। वह आधी दमड़ीकी हैसियतवाले कंगालोंके शिरोमणिको भी लोकपाल बना देता है। दानि जो चारि पदारथको, त्रिपुरारि, तिहूँ पुरमें सिरटीको । भोरो भलो, भले भायको भूखो, भलोइ कियो सुमिरें तुलसीको ॥ ता बिनु आसको दास भयो, कबहुँ न मिट्यो लघु लालचु जीको । माधो कहा करि साधन तें, जो पै राध्यो नहीं पति पारवतीको ॥ जो अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—इन चारों पदार्थोंका दाता है, त्रिपुरासुरका वध करनेवाला और तीनों लोकोंमें सबका सिरमौर बना हुआ है, जो बड़ा भोला है, केवल शुद्ध भावका भूखा है तथा स्मरण करनेपर जिसने तुलसीदासका भी भला ही किया है, उसको छोड़कर तू विषयोंकी आशाका दास बना हुआ है, किन्तु तुम्हारे जीका तुच्छ लोभ कभी नष्ट नहीं हुआ। तुलसीदास कहते हैं— यदि तूने पार्वतीपति भगवान् शङ्करकी आराधना नहीं की तो बहुत-से साधन करके भी क्या फल पाया ? जात जरे सब लोक बिलोकि तिलोचन सो विषु लोकि लियो है । पान कियो विषु, भूषन भो, करुनाबरुनालय साँइँ-हियो है ॥ मेरोइ फोरिबे जोगु कपारु, किधों कछु काहूँ लखाइ दियो है । काहे न कान करो बिनती तुलसी कलिकाल बेहाल कियो है ॥ सम्पूर्ण लोक जले जा रहे हैं यह देखकर त्रिनयन भगवान् शङ्करने उस हालाहल विषको लपककर लिया और शीघ्रतासे पी लिया। इससे वह विष आपका आभूषण हो गया। हे स्वामी! आपका हृदय तो करुणाका समुद्र है। मालूम नहीं, मेरा भाग्य ही