भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 228 में से

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पृष्ठ 207

कवितावली ३०४ छोड़ने योग्य है अथवा आपहीको किसीने मेरा कोई दोष दिखा दिया है। हे शङ्कर ! इस तुलसीको कलिकालने व्याकुल कर दिया है; आप इसकी प्रार्थनापर ध्यान क्यों नहीं देते ? खायो कालकूट, भयो अजर अमर तनु, भवनु मसानु, गथ गाठरी गरदकी। डमरू कपालु कर, भूषन कराल ब्याल, बावरे बड़ेकी रीझ वाहन बरदकी ॥ तुलसी विसाल गोरे गात बिलसति भूति, मानो हिमगिरि चारु चाँदनी सरदकी। अर्थ-धर्म-काम-मोच्छ बसत विलोकनिमें कासी करामाति जोगी जागति मरदकी ॥१५८॥ (महादेवजीने) कालकूट विष खाया था, किन्तु उनका शरीर अजर-अमर हो गया। अब श्मशान ही उनका निवासस्थान है और भस्मकी पोटली ही उनकी सम्पत्ति है। हाथमें डमरू और कपाल हैं, भयंकर सर्प ही उनके आभूषण हैं तथा उस अत्यन्त बावले महादेवकी बैलकी सवारीपर ही बड़ी रीझ (रुचि) है। तुलसीदासजी कहते हैं—उसके अति विशाल गौर शरीरपर विभूति सुशोभित है। सो ऐसी जान पड़ती है मानो हिमालय पर्वतपर शरत्कालीन चन्द्रिका छिटक रही हो। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—ये तो उसकी दृष्टिमें ही विराजते हैं, उस मर्द योगीकी करामात काशीमें प्रकट हो रही है। पिंगल जटाकलापु माथैपै पुनीत आपु, पावक नैना प्रताप अपार बरत हैं।

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