कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
कवितावली ३०४ छोड़ने योग्य है अथवा आपहीको किसीने मेरा कोई दोष दिखा दिया है। हे शङ्कर ! इस तुलसीको कलिकालने व्याकुल कर दिया है; आप इसकी प्रार्थनापर ध्यान क्यों नहीं देते ? खायो कालकूट, भयो अजर अमर तनु, भवनु मसानु, गथ गाठरी गरदकी। डमरू कपालु कर, भूषन कराल ब्याल, बावरे बड़ेकी रीझ वाहन बरदकी ॥ तुलसी विसाल गोरे गात बिलसति भूति, मानो हिमगिरि चारु चाँदनी सरदकी। अर्थ-धर्म-काम-मोच्छ बसत विलोकनिमें कासी करामाति जोगी जागति मरदकी ॥१५८॥ (महादेवजीने) कालकूट विष खाया था, किन्तु उनका शरीर अजर-अमर हो गया। अब श्मशान ही उनका निवासस्थान है और भस्मकी पोटली ही उनकी सम्पत्ति है। हाथमें डमरू और कपाल हैं, भयंकर सर्प ही उनके आभूषण हैं तथा उस अत्यन्त बावले महादेवकी बैलकी सवारीपर ही बड़ी रीझ (रुचि) है। तुलसीदासजी कहते हैं—उसके अति विशाल गौर शरीरपर विभूति सुशोभित है। सो ऐसी जान पड़ती है मानो हिमालय पर्वतपर शरत्कालीन चन्द्रिका छिटक रही हो। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—ये तो उसकी दृष्टिमें ही विराजते हैं, उस मर्द योगीकी करामात काशीमें प्रकट हो रही है। पिंगल जटाकलापु माथैपै पुनीत आपु, पावक नैना प्रताप अपार बरत हैं।
२७५ उत्तरकाण्ड
लोयन बिसाल लाल, सोहैं बालचंद्र भाल कंठ कालकूट, ब्याल-भूषन धरत हैं ॥ सुंदर दिगंबर, बिभूति गात, माँग खात, रूरै सृंगी पूरें काल-कंटक हरत हैं । देत न अघात रीझि, जात पात आकहीकें भोलानाथ जोगी जब औढर ढरत हैं ॥१५९॥
उनका जटाजूट पिंगलवर्ण है, मस्तकपर परमपवित्र गङ्गा- जल सुशोभित है । तथा उनके नेत्रस्थित अग्निकी ज्योति उनकी भौंहोंपर दमकती है । उनके नेत्र विशाल और अरुणवर्ण हैं, ललाटपर द्वितीयाका चन्द्र शोभायमान है, गलेमें कालकूट विष है, तथा वे सर्पोंके आभूषण धारण किये हुए हैं । उनका अति सुन्दर दिगम्बर वेष है और वे शरीरमें भस्म रमाये रहते हैं, भाँग खाते हैं तथा सींगका मनोहर शब्द करके कालरूपी कण्टकको निवृत्त कर देते हैं । जिस समय वे भोलानाथ योगी बेतरह प्रसन्न होते हैं उस समय वे देते-देते अघाते नहीं और स्वयं आकके पत्तोंसे ही रीझ जाते हैं ।
देत संपदासमेत श्रीनिकेत जाचकनि, भवन बिभूति-भाँग, वृषभ बहनु है । नाम बामदेव दाहिनो सदा असंग रंग अर्द्ध अंग अंगना, अनंगको महनु है ॥ तुलसी महेसको प्रभाव भावहीँ सुगम निगम-अगमहूको जानिबो गहनु है ।
कवितावली २०६ भेष नौ भिखारिको भयंकररूप संकर दयाल दीनबंधु दानि दारिददहनु है ॥१६०॥ जो माँगनेवालोंको सम्पत्तिसहित श्रीसम्पन्न अथवा लक्ष्मीजीका भवन अर्थात् वैकुण्ठ, भवन देते हैं; किन्तु जिनके घरमें केवल विभूति (भस्म) और भाँग है और चढ़नेके लिये जिनके बैलकी सवारी है, जिनका नाम तो 'वामदेव' है, किन्तु जो सर्वदा सबको दाहिने (अनुकूल) रहते हैं, सदा असंग (निर्लेपता का ठाट रहनेपर भी जिनके अर्धाङ्गमें पार्वतीजी रहती हैं तथा जो कामदेवका मथन करनेवाले हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—उन श्रीमहादेवजीका प्रभाव मात्र (भक्ति) से ही सुलभ है, नहीं तो वेद-शास्त्रके लिये भी उसका जानना अत्यन्त कठिन है। उनका वेष तो भिक्षुकोंका-सा है तथा रूप भी बड़ा भयानक है, किन्तु वे शङ्कर (कल्याण करनेवाले), दीनबन्धु, दयामय, दानिशिरोमणि तथा दारिद्र्यका नाश करनेवाले हैं। चाहै न अनंग-अरि एकौ अंग मागनेको देवोई पै जानिये, सुभावसिद्ध बानि सो। वारि बूंद चारि त्रिपुरारिपर डारिये तौं देत फल चारि, लेत सेवा सांची मानि सो॥ तुलसी भरोसो न भवेस भोरानाथको तौ कोटिक कलेस करौ, मरौ छार छानि सो। दारिद दमन दुख-दोष दाह दावानल दुनी न दयाल दूजो दानि सूलपानि-सो ॥१६१॥ मदनमथन भगवान् शङ्कर माँगनेवालेसे [षोडशोपचारमेंसे]
२०७ उत्तरकाण्ड किसी भी अंगकी इच्छा नहीं करते; वे तो केवल देना ही जानते हैं, यह उनकी स्वभावसिद्ध आदत है, यदि उनपर पानीकी चार बूँदें भी डाल दी जायें तो उसे ही वे सच्ची सेवा मान लेते हैं और उसके बदलेमें चारों फल दे डालते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—यदि तुम्हें विश्वेश्वर भगवान् भोलानाथका भरोसा नहीं है तो भले ही करोड़ों क्लेश करो और खाक छान-छानकर मर जाओ [ पल्ले कुछ पड़नेका नहीं ]; संसारमें शूलपाणि श्रीमहादेवजीके समान दारिद्रयको दूर करनेवाला तथा दुःख और दोषादिका दहन करनेके लिये दावानलरूप कोई दूसरा दयालु दानी नहीं है। काहेको अनेक देव सेवत जागै मसान, खोवत अपान, सठ ! होत हठि प्रेत रे। काहेको उपाय कोटि करत, मरत धाय, जाचत नरेस देस-देसके, अचेत रे ॥ तुलसी प्रतीति बिनु त्यागै तैं प्रयाग तनु, धनहीके हेत दान देत कुरुखेत रे। पात द्वै धतूरेके दै, भोरै कै, भवेससों, सुरेसहूकी संपदा सुभायसों न लेत रे ॥१६२॥ अरे अनेक देवताओंकी उपासनामें लगा रहकर मशान क्यों जगाता है ? अरे मूर्ख ! इस प्रकार तू अपनी प्रतिष्ठा खोकर आग्रहपूर्वक प्रेत क्यों बनता है ? अरे अज्ञानी ! तू करोड़ों उपाय करके दौड़-दौड़कर क्यों मरता है ? तथा देश-देशके राजाओंसे क्यों याचना करता फिरता है ? तुलसीदासजी कहते हैं-बिना विश्वासके ही तू प्रयागमें देहत्याग करता है। तथा धनके लिये
कवितावली २७८ ही तू कुरुक्षेत्रमें दान देता है ! [ उससे भी तुझ क्या लाभ होगा ? अरे ! भवनाथको दो धतूरेके पत्ते देकर और इस प्रकार उन्हें भुलावा देकर उनसे सहजहीमें इन्द्रकी सम्पत्ति क्यों नहीं ले लेता ? स्यंदन, गयंद, बाजिराजि, भले, भले, भट, धन-धाम-निकर करनिहूँ न पूजै क्वै । बनिता विनीत, पूत पावन सोहावन, औ विनय, विवेक, विद्या सुभग सरीर ज्वै ॥ इहाँ ऐसो सुख, परलोक सिवलोक ओक, जाको फल तुलसी सो सुनौ सावधान है। जानें, बिनु जानें, कै रिसानें, केलि कबहुँक सिवहि चढ़ाए हैंहैं बेलके पतौवा द्वै ॥१६३॥ जिसके यहाँ रथ, हाथी और घोड़ोंकी कतारें लगी हुई हैं, अच्छे-अच्छे योद्धा तथा धन-धामकी भी अधिकता है और जिसकी करनीको भी कोई नहीं पहुँच सकता; जिसकी स्त्री अत्यन्त विनीत, पुत्र बड़ा सदाचारी और सुन्दर तथा जिसे विनय, विवेक, विद्या और सुन्दर शरीर प्राप्त है । तुलसीदासजी कहते हैं—इस प्रकार उसे जो यहाँ ऐसा सुख प्राप्त है और परलोकमें शिवलोकमें स्थान मिलता है, यह सब फल जिस कर्मका है उसे सावधान होकर सुनो—उसने जानकर, बिना जाने, रूठकर अथवा खेलमें ही किसी समय श्रीमहादेवजीपर बेलके दो पत्ते चढ़ा दिये होंगे । रति-सी रवनि, सिंधुमेखला अवनि पति औनिप अनेक ठाढ़े हाथ जोरि हारि कै । संपदा-समाज देखि लाज सुरराजहूकें
२०९ उत्तरकाण्ड सुख सब विधि विधि दीन्हे हैं सवाँरि कै ॥ इहाँ ऐसो सुख, सुरलोक सुरनाथपद, जाको फल तुलसी सो कहैगो विचारि कै । आकके पनाँया चारि, फूल कै धतूरेके द्वै दीन्हे हूँहैं बारक पुरारिसिर डारिकै ॥१६४॥ जिसके रतिके समान सुन्दरी स्त्री है, जो आसमुद्र भूमण्डल- का अधिपति है, जिसके परास्त होकर अनेकों राजागण हाथ जोड़े खड़े रहते हैं, जिसकी सम्पत्ति और साज-सामानको देख- कर देवराज इन्द्रको भी लज्जा होती है; इस प्रकार जिसे विधाताने सभी प्रकारके सुख जुटाकर दिये हैं । जिसे इस लोकमें ऐसा सुख है और परलोकमें इन्द्रपद प्राप्त होता है, उसे यह सब जिस कर्मका फल मिला है, उसे तुलसीदास विचारकर कहता है— उसने या तो आकके चार पत्ते अथवा दो धतूरेके फूल एक बार महादेवजीपर डाल दिये होंगे । देवसरि सेवों बानदेर गाउँ रावरेहीं नाम रामहीके मागि उदर भरत हौं । दीवे जोग तुलसी न लेत काहूको कछुक, लिखी न भलाई भाल, पोच न करत हौं ॥ एते पर हूँ जो काऊ रावरो है जोर करै, ताको जोर, देव ! दीन द्वारे गुदरत हौं । पाइ कै उराहनो उगाहना न दीजो मोहि, कालकला कासीनाथ करै निरखत हौं ॥१६५॥ हे श्रीमहादेवजी ! मैं आपकीही पुरीमें रहकर श्र.गङ्गाजीका क० १४-
- कवितावली २१० सेवन करता हूँ तथा रामके नामपर टुकड़े माँगकर पेट भरता हूँ । यह तुलसी कुछ देने योग्य नहीं है, तो किसीका कुछ लेता भी नहीं; भलाई तो मेरे भाग्यमें ही नहीं लिखी, परन्तु मैं कोई बुराई भी नहीं करता । इतनेपर भी यदि कोई व्यक्ति आपका भक्त कहलाकर भी मुझसे बलात्कार करता है तो उसका वह बलप्रयोग दीन होकर आपके द्वारपर निवेदन कर देता हूँ । हे काशीनाथ ! [ मेरे प्रभु श्रीरघुनाथजीसे ] उलाहना पाकर मुझे उलाहना मत देना [ कि तुमने मुझे अपने कष्टकी सूचना क्यों नहीं दी ] । इसलिये मैं कालकी करतूत आपसे कहकर छुट्टी लेता हूँ ।* चेरो रामराइको, सुजस सुनि तेरो, हर ! पाइ तर आइ रह्यौँ सुरसरितीर हौं । बामदेव ! रामको सुभाव-सील जानियत नातो नेह जानियत रघुवीर भीर हौं ॥ अधिभूत बेदन विषम होत, भूतनाथ ! तुलसी बिकल, पाहि ! पचत कुपीर हौं । मारिये तौ अनायास कासीबास खास फल, ज्याइये तौ कृपा करि निरूजसरीर हौं ॥१६६॥ हे शङ्कर ! मैं महाराज रामका दास हूँ, आपका सुयश सुनकर आपके चरणोंमें श्रीगङ्गाजीके तटपर आ बसा हूँ । हे
- गोसाईंजीकी बढ़ती हुई प्रतिष्ठा देखकर काशीके बहुत-से विद्वानों- को सहन नहीं हुई । वे लोग तरह-तरहसे उन्हें कष्ट पहुँचानेका प्रयत्न करने लगे । उस समय गोसाईंजीने यह कवित्त रचकर श्रीमहादेवजीके यहाँ फ़रियाद की ।
२११ . उत्तरकाण्ड महादेवजी ! आप श्रीरघुनाथजीका शील-स्वभाव और हमारा स्नेह- सम्बन्ध तो जानते ही हैं; मैं श्रीरामचन्द्रजीसे ही डरता हूँ। हे भूतनाथ ! मेरे इस आधिभौतिक शरीरमें बड़ी प्रबल पीड़ा हो रही है, इससे तुलसीदास बहुत व्याकुल है; इस कुत्सित पीड़ासे मैं घुला जाता हूँ, आप रक्षा कीजिये। इससे तो यदि आप मार दें तो अनायास ही काशीवासका मुख्य फल प्राप्त हो जाय और यदि जिलाना चाहें तो कृपा करके मेरा शरीर नीरोग कर दीजिये।* जीवेकी न लालसा, दयाल महादेव ! मोहि, मालुम है तोहि, मरिबेईको रहतु हौं। कामरिपु ! रामके गुलामनिको कामतरु ! अवलंब जगदंब सहित चहतु हौं ॥ रोग भयो भूत-सो, कुभूत भयो तुलसी को, भूतनाथ, पाहि ! पदपंकज गहतु हौं । ज्याइये तौ जानकीरमन-जन जानि जियँ मारिये तो मागी मीचु सूधियै कहतु हौं ॥१६७॥ हे दयामय महादेवजी ! मुझे जीवित रहनेकी इच्छा नहीं है। यह आप जानते ही हैं कि मैं मरनेके ही लिये [काशीपुरीमें] रहता हूँ। हे कामारि ! आप भगवान् रामके दासोंके लिये कल्प- वृक्षके समान हैं, मैं जगन्माता पार्वतीजीके सहित आपका आश्रय चाहता हूँ। [भैरवजीकी प्रेरणासे] यह रोग भूतकी तरह मेरे
- एक बार भैरवजीने गोसाईंजीकी भुजामें दर्द उत्पन्न कर दिया था। उस समय उन्होंने इन तीन कवित्तोंद्वारा श्रीविश्वनाथकी प्रार्थना की थी।
पीछे लग गया है, जिसके कारण इस तुलसीदासको बड़ा कष्ट हो रहा है । अतः हे भूतनाथ ! आप रक्षा कीजिये, मैं आपके चरणकमल पकड़ता हूँ । यदि मुझे जिलाना है तो जानकीवल्लभ- का दास जानकर जिलाइये और यदि मारना है तो आपसे साफ़- साफ़ कहता हूँ मुझे मुँहमाँगी मौत दीजिये [ अर्थात् मृत्यु तो मैं स्वयं भी माँगता हूँ; वह मुझे प्रसन्नतापूर्वक दीजिये ] । भूतभव ! भवत पिसाच-भूत-प्रेत-प्रिय, आपनो समाज सिव आपु नीकें जानिये । नाना वेष, वाहन, विभूषन, बसन, वास, खानपान बलि-पूजा-विधि को बखानिये ॥ रामके गुलामनिकी रीति, प्रीति सूधी सब, सबसों सनेह, सबहीको सनमानिये । तुलसीकी सुधरै सुधारै भूतनाथहीके मेरे माय बाप गुरु संकर-भवानिये ॥१६८॥ हे पञ्च महाभूतोंके कारणस्वरूप शिवजी ! आपको भूत, प्रेत एवं पिशाच प्रिय हैं, आप अपने समाजको अच्छी तरह जानते हैं । उनके वेष, वाहन, आभूषण, वस्त्र, निवासस्थान, खान-पान, बलि और पूजाविधि अनेक प्रकारके हैं, उनका कौन वर्णन कर सकता है ? रामके दासोंका व्यवहार और प्रेम तो सीधा-सादा होता है, वे सभीसे प्रेम रखते हैं और सभीका सम्मान करते हैं । [ अतः मेरे व्यवहारसे मेरा सम्मान बढ़ा देखकर जो भैरवजीने मुझे दण्ड दिया है, उसमें मेरा क्या अपराध है ? ] अब तुलसीदासकी बात तो श्रीभूतनाथके सुधारनेसे ही
३१४ उत्तरकाण्ड सुधरेगी—मेरे माता-पिता और गुरु तो श्रीशङ्कर और पार्वतीजी ही हैं। काशीमें महामारी गौरीनाथ, भोरानाथ, भगत भवानीनाथ ! विस्वनाथपुर फिरी आन कलिकालकी । संकर-से नर, गिरिजा-सी नारीं कासीबासी, बेद कही, सही ससिसेखर कृपालुकी ॥ छमुख-गनेस तें महेसके पियारे लोग बिकल बिलोकियत, नगरी बिहाल की । पुरी-सुरबेलि केलि काटत किरात कलि निठुर निहारिये उघारि डीठि भालकी ॥१६९॥ हे पार्वतीपने ! हे भोलानाथ ! हे भवानीपने ! इस विश्वनाथ- पुरी-काशीमें आज कलिकालकी दुहाई फिरी हुई है। काशीमें रहनेवाले पुरुष शङ्करके समान हैं और स्त्रियाँ पार्वतीजीके सदृश हैं—ऐसा वेदने कहा है और इसपर कृपालु चन्द्रशेखरकी भी सही है; किन्तु हे महेश ! आज [कलिके प्रतापसे] वे लोग जो शङ्करको षडानन और गणेशसे भी प्यारे हैं, बड़े व्याकुल दीख पड़ते हैं, सारी काशीपुरीको (इस कलिने) बेहाल कर दिया है। यह कलिरूप निष्ठुर किरात आपकी पुरीरूप कल्पलताको खेलहीमें काट रहा है। इसे अपने मस्तकका नेत्र खोलकर देखिये। ठाकुर महेस, ठकुराइनि उमा-सी जहाँ, लोक-वेदहूँ विदित महिमा ठहरकी । भट रुद्रगन, पूत गणपति-सेनापति
कवितावली २१४ कलिकालकी कुचाल काहू तौ न हरकी ॥ बीसीं विस्वनाथकी बिसाद् बड़ो बारानसीं, बूझिये न ऐसी गति संकर-सहरकी। कैसे कहै तुलसी वृषासुरके वरदानि बानि जानि सुधा तजि पीवनि जहरकी ॥१७०॥ जहाँके महादेवजी-जैसे स्वामी और पार्वतीजी-जैसी स्वामिनी हैं तथा लोक और वेदमें भी जिस स्थानकी महिमा प्रसिद्ध है, जहाँ रुद्रके गण ही योद्धा हैं और श्रीषडानन एवं गणेशजी सेनापति हैं, वहाँ भी कलिकी कुचालको किसीने नहीं रोका। इस विश्वनाथ- की बीसीमें उस वाराणसीमें बड़ा भारी विषाद छाया हुआ है; शङ्करके नगरकी ऐसी दुर्दशा है कि पूछो मत। वे भस्मासुरको वर देनेवाले ठहरे, उनका अमृत छोड़कर विष पीनेका स्वभाव जानकर भी तुलसीदास उनके विषयमें किस प्रकार कोई बात कह सकता है ? [अर्थात् उनका तो स्वभाव ही उलटा है, इसलिये नगरकी चिन्ता न कर यदि वे कलियुगको पाले हुए हैं तो कोई आश्चर्य नहीं।] लोक-वेदहूँ विदित बारानसीकी बड़ाई बासी नरनारि ईस-अंबिका-सरूप हैं। कालनाथ कोतवाल, दंडकारि दंडपानि, सभासद गनप-से अमित अनूप हैं॥ तहाँऊँ कुचालि कलिकालकी कुरीति, कैधौं जानत न मूढ़ इहाँ भूतनाथ भूप हैं।
२१५ उत्तरकाण्ड फलैं फूलैं फैलैं खल, सीदैं साधु पल-पल खाती दीपमालिका, ठठाइयत सूप हैं ॥१७१॥ काशीका महत्त्व लोक और वेद दोनोंमें प्रसिद्ध है। यहाँके निवासी श्रीशङ्कर और पार्वतीरूप हैं। कालभैरव-जैसे तो यहाँके कोतवाल हैं, दण्डपाणि भैरव-जैसे दण्ड देनेवाले जज हैं तथा गणेशजी-जैसे अनेकों अनुपम सभासद् हैं। किन्तु कुचाली कलियुगने वहाँ भी अपनी कुचेष्टा नहीं छोड़ी ! अथवा वह मूर्ख जानता नहीं कि यहाँके राजा साक्षात् भूतनाथ हैं। आजकल सब बातें उल्टी देखनेमें आती हैं; दुष्ट लोग तो खूब फलते, फूलते और फैलते हैं तथा साधुजन पल-पलमें दुःख उठाते हैं; जैसे कहावत है—घी तो खाय दीपमालिका और दूसरे दिन ठोंका जाता है सूप । पंचकोस पुन्यकोस स्वारथ-परारथको जानि आपु आपने सुपास वास दियो है। नीच नर-नारि न सँभारि सके आदर, लहत फल कादर विचारि जो न कियो है। बारी बारानसी बिनु कहे चक्रपानि चक्र, मानि हितहानि सो मुरारि मन भियो है। रोसमें भरोसो एक आसुतोस कहि जात बिकल बिलोकि लोक कालकूट पियो है ॥१७२॥ पाँच कोसके बीचमें बसा हुआ काशीक्षेत्र पुण्यका खजाना और स्वार्थ-परमार्थ दोनोंका साधक है—यह जानकर आपने यहाँके
कवितावली २१६ निवासियोंको अपने पार्श्वमें बसाया है, किन्तु नीच स्त्री-पुरुष इस आदरंगको सह नहीं सके; इसलिये उन्होंने जो कर्म विचारकर नहीं किये उन्हींका फल वे कायर लोग भोगते हैं। किन्तु यह कलिकाल आपसे भय नहीं मानता, यह बड़े आश्चर्य्यकी बात है। देखिये, सुदर्शन चक्रने भगवान् कृष्णके बिना कहे ही [मिथ्यावासुदेव पौण्ड्रकका वध करनेके अनन्तर] काशीको जला दिया था [उसमें यद्यपि श्रीकृष्णका कोई अपराध नहीं था तो भी] आपके प्रेमकी हानि जानकर उनके चित्तमें बड़ा ही संकोच है [फिर बेचारा कलि तो किस खेतकी मूली है] दैवका कोप होनेपर तो एकमात्र आप आशुतोषका ही भरोसा कहा जाता है, क्योंकि लोकोंको व्याकुल देखकर आपने तो कालकूट विष पिया था। रचत विरंचि, हरि पालत, हरत हर, तेरे हीं प्रसाद जग, अग-जग-पालिके। तोहिमें विकास विस्व, तोहिमें विलास सब, तोहिमें समात, मातु भूमिधरबालिके ॥ दीजै अवलंब, जगदंब ! न विलंब कीजै, करुनातरंगिनी कृपा-तरंग-मालिके। रोप महामारी, परितोष महतारी दुनी देखिये दुखारी, मुनि-मानस-मरालिके ॥१७२॥ हे चराचरका पालन करनेवाली माता पार्वती ! तेरी ही कृपासे ब्रह्माजी सृष्टिकी रचना करते हैं, विष्णु पालन
२१७ उत्तरकाण्ड
करते हैं और महादेवजी संहार करते हैं। सारे विश्वका तेरेहीमें विकास होता है, तेरेहीमें उसकी स्थिति है और फिर तेरेहीमें उसका लय होता है। हे जगजननी ! तुम कृपा-तरङ्गावलिसे विभूषित करुणामयी सरिता हो। तुम देरी न करके मुझे आश्रय दो। हे मुनिमनमानसमरालिके ! कुपित होनेपर तुम महामारी हो जाती हो और प्रसन्न होनेपर तुम्हीं संसारकी साक्षात् जननीस्वरूपा हो; अतः अब तुम कृपादृष्टिसे हम दुखियोंकी ओर देखो। निपट बसेरे अघ-औगुन घनेरे, नर- नारिऊ अनेरे जगदंब ! चेरी-चेरे हैं। दारिद-दुखारी देवि भूसुर भिखारी-भीरु लोभ मोह काम कोह कलिमल घेरे हैं ॥ लोकरीति राखी राम, साखी बामदेव जानि जनकी विनति मानि मातु ! कहि मेरे हैं। महामारी महेसानि ! महिमाकी खानि, मोद- मंगलकी रासि, दास कासीवासी तेरे हैं ॥१७४॥ हे जगन्मातः ! यहाँके अन्यायी नर-नारी यद्यपि पाप और अवगुणोंके पूरे निवासस्थान हैं तो भी वे हैं तेरे ही दास-दासी। हे देवि ! वे दरिद्रताके कारण अत्यन्त दुखी हैं; ब्राह्मण लोग भिखमंगे और बड़े डरपोक हो गये हैं; इसलिये लोभ, मोह, काम और क्रोध- रूप कलिकलुषने उन्हें घेर लिया हैं। देख, भगवान् रामने भी [ अपनी प्रजाके गुण-दोषोंकी ओर दृष्टि न देकर ] लोकमर्यादाकी रक्षा की थी, इसमें स्वयं श्रीमहादेवजी साक्षी हैं—ऐसा जानकर हे मातः ! इस दासकी प्रार्थनापर ध्यान देकर एक बार ऐसा कह दे
कवितावली २१८ कि 'ये सब मेरे हैं।' हे महामारी ! हे महिमाकी खानि एवं मंगल और आनन्दकी राशि महेश्वरि ! ये काशीवासी तेरे ही दास हैं। लोगनिकें पाप कैधौं, सिद्ध-सुर-साप कैधौं, कालकें प्रताप कासी तिहूँ ताप तई है। ऊँचे, नीचे, बीचके, धनिक, रंक, राजा, राय हठनि बजाइ करि डीठि पीठि दई है ॥ देवता निहोरे, महामारिन्ह सों कर जोरे, भोरानाथ जानि भोरे आपनी-सी ठई है। करुनानिधान हनुमान बीर बलवान ! जसरासि जहाँ-तहाँ तैंहीं लुटि लई है ॥१७५॥ न जाने लोगोंका पाप है अथवा सिद्ध और देवताओंका शाप है या समयका प्रताप है, जिसके कारण काशी तीनों तापोंसे तप रही है। इस समय ऊँच, नीच, मध्यम श्रेणीके लोग, धनी, निर्धन, राजा और राव सभीने हठपूर्वक, खुल्लमखुल्ला, सब कुछ देखकर भी पीठ फेर ली है। देवताओंकी प्रार्थना की और महामारियोंको भी हाथ जोड़े; परन्तु इन्होंने भोलानाथको सीधा-सादा जानकर मनमानी ठान रक्खी है। हे करुणानिधान, बलवान्, वीर हनुमान्जी ! जहाँ-तहाँ आपहीने यशकी राशि लूटी है [ अतः आप ही यहाँके लोगोंका भी दुःख दूर करके यशस्वी होइये ]। संकर-सहर सर, नरनारि वारिचर बिकल सकल, महामारी माजा भई है।
२१९ उत्तरकाण्ड उछरत उतरात हहरात मरि जात, भभरि भगात जल-थल मीचुमई है॥ देव न दयाल, महिपाल न कृपालुचित, बारानसीं बाढ़ति अनीति नित नई है। पाहि रघुराज ! पाहि कपिराज रामदूत ! रामहूकी विगरी तुहीं सुधारि लई है ॥१७६॥ इस शिवपुरीरूप सरोवर के नर-नारीरूप समस्त जलचर बड़े व्याकुल हैं; यह महामारी उनके लिये माजा* हो रही है । वे उछलते हैं, तैरते हैं, घबड़ाकर भागते हैं और हाय-हाय करके मर जाते हैं। इस प्रकार सारा जल-थल मृत्युमय हो रहा है। इस समय देवतालोग दया नहीं करते तथा राजालोग भी कृपालुचित्त नहीं हैं। अतः वाराणसीमें नित्य-नवीन अन्याय बढ़ रहा है। हे रघुराज ! रक्षा कीजिये । हे वानरराज हनुमान्जी ! रक्षा कीजिये; भगवान् रामकी बात बिगड़नेपर भी आपहीने उसे सँभाला था ; अतः यहाँ भी आप ही कृपा कीजिये ] । एक तौ कराल कलिकाल सूल-मूल, तामें कोढ़मेंकी खाजुसी सनीचरी है मीनकी । वेद-धर्म दूरि गए, भूमि चोर भूप भए, साधु सीद्यमान जानि रीति पाप पीनकी ॥ दूबरेको दूसरो न द्वार, राम दयाधाम ! रावरीऐ गति बल-विभव बिहीन की ।
- जलचरोंमें होनेवाला एक प्रकारका रोग ।
कवितावली २२५ लागैगी पै लाज वा विराजमान विरुदहि, महाराज ! आजुजौं न देत दादि दीनकी ॥१७७॥ एक तो सारे दुःखोंका मूलभूत यह भयंकर कलिकाल और उसमें भी कोढ़में खाजके समान मीनराशिपर शनैश्चरकी स्थिति है। इसीसे इस समय वेद-धर्म तो लुप्त हो गये हैं, लुटेरे ही राजा हो गये तथा बढ़े हुए पापकी गति देखकर साधुजन दुखी हैं। हे दयाधाम भगवान्-सम ! दुर्बल पुरुषोंके लिये कोई दूसरा द्वार नहीं है, बल- वैभवशून्य पुरुषोंको तो एकमात्र आपकी ही गति है। हे महाराज ! यदि इस समय आपने इन दीनोंकी सहायता न की तो आपके उस (सर्वोपरि) विराजमान विरदको लज्जित होना पड़ेगा। विविध रामनाम मातु-पितु, स्वामि समरथ, हितु, आस रामनामकी, भरोसो रामनामको। प्रेम रामनामहीसों, नेम रामनामहीको, जानों ना मरम पद दाहिनो न वामको ॥ स्वारथ सकल परमारथको रामनाम, रामनाम हीन तुलसी न काहू कामको। रामकी सपथ, सरबस मेरें रामनाम, कामधेनु-कामतरु मोसे छीन-छामको ॥१७८॥ रामनाम ही मेरा माता-पिता है, वही मेरा समर्थ स्वामी और हितकारी है, मुझे रामनामसे ही सब प्रकारकी आशा है और राम- नामका ही भरोसा है। रामनामसे ही मेरा प्रेम है और रामनाम
२२१ उत्तरकाण्ड जपनेका ही नियम है। [ रामनामके अतिरिक्त ] और किसी अनुकूल-प्रतिकूल मार्गका मुझे कोई भेद ज्ञात नहीं है। रामनाम ही मेरे सारे स्वार्थ और परमार्थको सिद्ध करनेवाला है, रामनामके बिना तुलसीदास किसी कामका नहीं है। मैं रामकी शपथ करके कहता हूँ-रामनाम ही मेरा सर्वस्व है और वही मेरे-जैसे दीन- दुर्बलके लिये कामधेनु और कल्पवृक्षके समान है। मारग मारि, महीसुर मारि, कुमारग कोटिककै धन लीयो। संकरकोपसों पापको दाम परीच्छित जाहिगो जारि कै हं या ॥ कासीमें कंटक जेते भये ते गे पाइ अघाइ कै आपनो कीयो। आजु कि कालि परों कि नरों जड जाहिंगे चाटि दिवारीको दीयो॥ जिन लोगोंने पथिकोंको लूटकर अथवा ब्राह्मणोंको मार (सता) कर करोड़ों कुमार्गोंसे धन एकत्रित किया है उनका वह धन भगवान् शङ्करके कोपसे हृदयको जलाकर जायगा— यह बात खूब परीक्षा की हुई है। काशीमें जितने कण्टक (पापी) हुए हैं वे अपनी करनीका भली प्रकार फल भोगकर नष्ट हो गये हैं। ये सब भी आज, कल, परसों अथवा नरसों दिवालीका दिया चाटकर जायेंगे ही [कहते हैं दीपावलीका दीया चाटकर सर्प चले जाते हैं, फिर वे दिखायी नहीं देते। इसी प्रकार ये पापी लोग भी ऐसे नष्ट होंगे कि इनका कोई पता नहीं चलेगा]। कुंकुम रंग सुअंग जितो, मुखचंदसों चंदसों होड़ परी है। बोलत बोल समृद्धि चुवै, अवलोकत सोच-विषाद हरी है॥ गौरी कि गंग विहंगनिवेष, कि मंजुल मूरति मोदमयी है। पेखि सप्रेम पयान समै सब सोच विमोचन छेमकरी है ॥१८०॥
कवितावली २३२ जिसने अपने शरीरकी आभासे कुंकुमको जीत लिया है तथा जिसका मुखचन्द्र चन्द्रमासे होड़ बदता है, जिसके बोलनेमें सब प्रकारकी समृद्धि चूने लगती है और जो देखने ही सब प्रकारकी चिन्ता और खेदको हर लेती है; यह पक्षिणीके वेषमें साक्षात् गौरी है या गङ्गा ? अथवा आनन्दसे परिपूर्ण किसी अन्य देव.की मनोहर मूर्ति है। इस क्षेमकरी (लाल रंगकी चील्ह) को कहीं जाते समय प्रेमपूर्वक देखा जाय तो यह सब प्रकारके शोकोंकी निवृत्ति करनेवाली होती है। मंगलकी रासि, परमारथकी खानि जानि विरचि बनाई विधि, केसव बसाई है। प्रलयहूँ काल राखी सूलपानि सूलपर, मीचुवस नीच सोऊ चाहत खसाई है ॥ छाडि छितिपाल जो परीछित भए कृपाल, भलो कियो खलको, निकाई सो न साई है। पाहि हनुमान ! करुनानिधान राम पाहि ! कासी-कामधेनु कलि कुहत कसाई है ॥१८१॥ विधाताने काशीको मङ्गलकी राशि और परमार्थकी खानि जानकर रचा है और श्रीविष्णु भगवान्ने उसे बसाया है। प्रलय- कालमें भी भगवान् शङ्करने उसे अपने त्रिशूलपर रखकर बचाया था, उसीको यह मृत्युके वशीभूत हुआ नीच कलि गिराना चाहता है। महाराज परीक्षित्ने इसे छोड़कर इसपर कृपा की और इस दुष्टका भला किया; उस उपकारको इसने भुला ही दिया। हे हनुमान्जी ! रक्षा कीजिये; हे करुणानिधान भगवान् राम ! बचाइये; यह कलिरूप कसाई काशीरूप कामधेनुको मारे डालता है।
२२३ उत्तरकाण्ड विरची विरंचिकी, वसति विस्वनाथकी जो, प्रानहू तें प्यारी पुरी केसव कृपालकी। जोतिरूप लिंगमई अगनित लिंगमयी मोच्छ वितरनि, बिदरनि जगजालकी ॥ देवी-देव-देवसरि-सिद्ध-मुनिवर-बास लोपति बिलोकत कुलिपि भोंडे भालकी। हा हा करै तुलसी, दयानिधान राम ! ऐसी कासीकी कदर्थना कराल कलिकालकी ॥१८४॥ जो ब्रह्माजीकी रची हुई है और स्वयं विश्वनाथकी राजधानी है, और जो कृपामय विष्णु भगवान्को प्राणोंसे भी प्यारी है, वह ज्योतिर्लिङ्गमयी और अगणित लिङ्गमयी पुरी मोक्षदान करनेवाली और जगजालको नष्ट करनेवाली है। वह देवी, देवता, सुरसरि, सिद्धजन और मुनिवरोंकी निवासभूमि है और दर्शनमात्रसे ही अभागोंके ललाटपर लिखी हुई दुर्भाग्यकी रेखाको मिटा देती है, ऐसी काशीकी भी इस कलिकालने दुर्दशा कर रखी है जिसे देखकर, हे दयानिधान श्रीराम ! यह तुलसीदास हाहा खाता है [ आप कृपाकर इसकी रक्षा कीजिये ] । आश्रम-बरन कलि बिबस बिकल भए निज-निज मरजाद मोटरी-सी डार दी। संकर सरोष महामारीहीतें जानियत, साहिब-सरोष दुनी दिन-दिन दारदी ॥ नारि-नर आरत पुकारत, सुनै न कोऊ, काहूँ देवतनि मिलि मोटी मूठि मारि दी।