भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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कवितावली २२५ लागैगी पै लाज वा विराजमान विरुदहि, महाराज ! आजुजौं न देत दादि दीनकी ॥१७७॥ एक तो सारे दुःखोंका मूलभूत यह भयंकर कलिकाल और उसमें भी कोढ़में खाजके समान मीनराशिपर शनैश्चरकी स्थिति है। इसीसे इस समय वेद-धर्म तो लुप्त हो गये हैं, लुटेरे ही राजा हो गये तथा बढ़े हुए पापकी गति देखकर साधुजन दुखी हैं। हे दयाधाम भगवान्-सम ! दुर्बल पुरुषोंके लिये कोई दूसरा द्वार नहीं है, बल- वैभवशून्य पुरुषोंको तो एकमात्र आपकी ही गति है। हे महाराज ! यदि इस समय आपने इन दीनोंकी सहायता न की तो आपके उस (सर्वोपरि) विराजमान विरदको लज्जित होना पड़ेगा। विविध रामनाम मातु-पितु, स्वामि समरथ, हितु, आस रामनामकी, भरोसो रामनामको। प्रेम रामनामहीसों, नेम रामनामहीको, जानों ना मरम पद दाहिनो न वामको ॥ स्वारथ सकल परमारथको रामनाम, रामनाम हीन तुलसी न काहू कामको। रामकी सपथ, सरबस मेरें रामनाम, कामधेनु-कामतरु मोसे छीन-छामको ॥१७८॥ रामनाम ही मेरा माता-पिता है, वही मेरा समर्थ स्वामी और हितकारी है, मुझे रामनामसे ही सब प्रकारकी आशा है और राम- नामका ही भरोसा है। रामनामसे ही मेरा प्रेम है और रामनाम

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