भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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२२१ उत्तरकाण्ड जपनेका ही नियम है। [ रामनामके अतिरिक्त ] और किसी अनुकूल-प्रतिकूल मार्गका मुझे कोई भेद ज्ञात नहीं है। रामनाम ही मेरे सारे स्वार्थ और परमार्थको सिद्ध करनेवाला है, रामनामके बिना तुलसीदास किसी कामका नहीं है। मैं रामकी शपथ करके कहता हूँ-रामनाम ही मेरा सर्वस्व है और वही मेरे-जैसे दीन- दुर्बलके लिये कामधेनु और कल्पवृक्षके समान है। मारग मारि, महीसुर मारि, कुमारग कोटिककै धन लीयो। संकरकोपसों पापको दाम परीच्छित जाहिगो जारि कै हं या ॥ कासीमें कंटक जेते भये ते गे पाइ अघाइ कै आपनो कीयो। आजु कि कालि परों कि नरों जड जाहिंगे चाटि दिवारीको दीयो॥ जिन लोगोंने पथिकोंको लूटकर अथवा ब्राह्मणोंको मार (सता) कर करोड़ों कुमार्गोंसे धन एकत्रित किया है उनका वह धन भगवान् शङ्करके कोपसे हृदयको जलाकर जायगा— यह बात खूब परीक्षा की हुई है। काशीमें जितने कण्टक (पापी) हुए हैं वे अपनी करनीका भली प्रकार फल भोगकर नष्ट हो गये हैं। ये सब भी आज, कल, परसों अथवा नरसों दिवालीका दिया चाटकर जायेंगे ही [कहते हैं दीपावलीका दीया चाटकर सर्प चले जाते हैं, फिर वे दिखायी नहीं देते। इसी प्रकार ये पापी लोग भी ऐसे नष्ट होंगे कि इनका कोई पता नहीं चलेगा]। कुंकुम रंग सुअंग जितो, मुखचंदसों चंदसों होड़ परी है। बोलत बोल समृद्धि चुवै, अवलोकत सोच-विषाद हरी है॥ गौरी कि गंग विहंगनिवेष, कि मंजुल मूरति मोदमयी है। पेखि सप्रेम पयान समै सब सोच विमोचन छेमकरी है ॥१८०॥