भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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२१९ उत्तरकाण्ड उछरत उतरात हहरात मरि जात, भभरि भगात जल-थल मीचुमई है॥ देव न दयाल, महिपाल न कृपालुचित, बारानसीं बाढ़ति अनीति नित नई है। पाहि रघुराज ! पाहि कपिराज रामदूत ! रामहूकी विगरी तुहीं सुधारि लई है ॥१७६॥ इस शिवपुरीरूप सरोवर के नर-नारीरूप समस्त जलचर बड़े व्याकुल हैं; यह महामारी उनके लिये माजा* हो रही है । वे उछलते हैं, तैरते हैं, घबड़ाकर भागते हैं और हाय-हाय करके मर जाते हैं। इस प्रकार सारा जल-थल मृत्युमय हो रहा है। इस समय देवतालोग दया नहीं करते तथा राजालोग भी कृपालुचित्त नहीं हैं। अतः वाराणसीमें नित्य-नवीन अन्याय बढ़ रहा है। हे रघुराज ! रक्षा कीजिये । हे वानरराज हनुमान्जी ! रक्षा कीजिये; भगवान् रामकी बात बिगड़नेपर भी आपहीने उसे सँभाला था ; अतः यहाँ भी आप ही कृपा कीजिये ] । एक तौ कराल कलिकाल सूल-मूल, तामें कोढ़मेंकी खाजुसी सनीचरी है मीनकी । वेद-धर्म दूरि गए, भूमि चोर भूप भए, साधु सीद्यमान जानि रीति पाप पीनकी ॥ दूबरेको दूसरो न द्वार, राम दयाधाम ! रावरीऐ गति बल-विभव बिहीन की ।

  • जलचरोंमें होनेवाला एक प्रकारका रोग ।