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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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कवितावली २१८ कि 'ये सब मेरे हैं।' हे महामारी ! हे महिमाकी खानि एवं मंगल और आनन्दकी राशि महेश्वरि ! ये काशीवासी तेरे ही दास हैं। लोगनिकें पाप कैधौं, सिद्ध-सुर-साप कैधौं, कालकें प्रताप कासी तिहूँ ताप तई है। ऊँचे, नीचे, बीचके, धनिक, रंक, राजा, राय हठनि बजाइ करि डीठि पीठि दई है ॥ देवता निहोरे, महामारिन्ह सों कर जोरे, भोरानाथ जानि भोरे आपनी-सी ठई है। करुनानिधान हनुमान बीर बलवान ! जसरासि जहाँ-तहाँ तैंहीं लुटि लई है ॥१७५॥ न जाने लोगोंका पाप है अथवा सिद्ध और देवताओंका शाप है या समयका प्रताप है, जिसके कारण काशी तीनों तापोंसे तप रही है। इस समय ऊँच, नीच, मध्यम श्रेणीके लोग, धनी, निर्धन, राजा और राव सभीने हठपूर्वक, खुल्लमखुल्ला, सब कुछ देखकर भी पीठ फेर ली है। देवताओंकी प्रार्थना की और महामारियोंको भी हाथ जोड़े; परन्तु इन्होंने भोलानाथको सीधा-सादा जानकर मनमानी ठान रक्खी है। हे करुणानिधान, बलवान्, वीर हनुमान्‌जी ! जहाँ-तहाँ आपहीने यशकी राशि लूटी है [ अतः आप ही यहाँके लोगोंका भी दुःख दूर करके यशस्वी होइये ]। संकर-सहर सर, नरनारि वारिचर बिकल सकल, महामारी माजा भई है।