कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली २७८ ही तू कुरुक्षेत्रमें दान देता है ! [ उससे भी तुझ क्या लाभ होगा ? अरे ! भवनाथको दो धतूरेके पत्ते देकर और इस प्रकार उन्हें भुलावा देकर उनसे सहजहीमें इन्द्रकी सम्पत्ति क्यों नहीं ले लेता ? स्यंदन, गयंद, बाजिराजि, भले, भले, भट, धन-धाम-निकर करनिहूँ न पूजै क्वै । बनिता विनीत, पूत पावन सोहावन, औ विनय, विवेक, विद्या सुभग सरीर ज्वै ॥ इहाँ ऐसो सुख, परलोक सिवलोक ओक, जाको फल तुलसी सो सुनौ सावधान है। जानें, बिनु जानें, कै रिसानें, केलि कबहुँक सिवहि चढ़ाए हैंहैं बेलके पतौवा द्वै ॥१६३॥ जिसके यहाँ रथ, हाथी और घोड़ोंकी कतारें लगी हुई हैं, अच्छे-अच्छे योद्धा तथा धन-धामकी भी अधिकता है और जिसकी करनीको भी कोई नहीं पहुँच सकता; जिसकी स्त्री अत्यन्त विनीत, पुत्र बड़ा सदाचारी और सुन्दर तथा जिसे विनय, विवेक, विद्या और सुन्दर शरीर प्राप्त है । तुलसीदासजी कहते हैं—इस प्रकार उसे जो यहाँ ऐसा सुख प्राप्त है और परलोकमें शिवलोकमें स्थान मिलता है, यह सब फल जिस कर्मका है उसे सावधान होकर सुनो—उसने जानकर, बिना जाने, रूठकर अथवा खेलमें ही किसी समय श्रीमहादेवजीपर बेलके दो पत्ते चढ़ा दिये होंगे । रति-सी रवनि, सिंधुमेखला अवनि पति औनिप अनेक ठाढ़े हाथ जोरि हारि कै । संपदा-समाज देखि लाज सुरराजहूकें