भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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२०९ ⁠ उत्तरकाण्ड सुख सब विधि विधि दीन्हे हैं सवाँरि कै ॥ इहाँ ऐसो सुख, सुरलोक सुरनाथपद, जाको फल तुलसी सो कहैगो विचारि कै । आकके पनाँया चारि, फूल कै धतूरेके द्वै दीन्हे हूँहैं बारक पुरारिसिर डारिकै ॥१६४॥ जिसके रतिके समान सुन्दरी स्त्री है, जो आसमुद्र भूमण्डल- का अधिपति है, जिसके परास्त होकर अनेकों राजागण हाथ जोड़े खड़े रहते हैं, जिसकी सम्पत्ति और साज-सामानको देख- कर देवराज इन्द्रको भी लज्जा होती है; इस प्रकार जिसे विधाताने सभी प्रकारके सुख जुटाकर दिये हैं । जिसे इस लोकमें ऐसा सुख है और परलोकमें इन्द्रपद प्राप्त होता है, उसे यह सब जिस कर्मका फल मिला है, उसे तुलसीदास विचारकर कहता है— उसने या तो आकके चार पत्ते अथवा दो धतूरेके फूल एक बार महादेवजीपर डाल दिये होंगे । देवसरि सेवों बानदेर गाउँ रावरेहीं नाम रामहीके मागि उदर भरत हौं । दीवे जोग तुलसी न लेत काहूको कछुक, लिखी न भलाई भाल, पोच न करत हौं ॥ एते पर हूँ जो काऊ रावरो है जोर करै, ताको जोर, देव ! दीन द्वारे गुदरत हौं । पाइ कै उराहनो उगाहना न दीजो मोहि, कालकला कासीनाथ करै निरखत हौं ॥१६५॥ हे श्रीमहादेवजी ! मैं आपकीही पुरीमें रहकर श्र.गङ्गाजीका क० १४-