कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०७ उत्तरकाण्ड किसी भी अंगकी इच्छा नहीं करते; वे तो केवल देना ही जानते हैं, यह उनकी स्वभावसिद्ध आदत है, यदि उनपर पानीकी चार बूँदें भी डाल दी जायें तो उसे ही वे सच्ची सेवा मान लेते हैं और उसके बदलेमें चारों फल दे डालते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—यदि तुम्हें विश्वेश्वर भगवान् भोलानाथका भरोसा नहीं है तो भले ही करोड़ों क्लेश करो और खाक छान-छानकर मर जाओ [ पल्ले कुछ पड़नेका नहीं ]; संसारमें शूलपाणि श्रीमहादेवजीके समान दारिद्रयको दूर करनेवाला तथा दुःख और दोषादिका दहन करनेके लिये दावानलरूप कोई दूसरा दयालु दानी नहीं है। काहेको अनेक देव सेवत जागै मसान, खोवत अपान, सठ ! होत हठि प्रेत रे। काहेको उपाय कोटि करत, मरत धाय, जाचत नरेस देस-देसके, अचेत रे ॥ तुलसी प्रतीति बिनु त्यागै तैं प्रयाग तनु, धनहीके हेत दान देत कुरुखेत रे। पात द्वै धतूरेके दै, भोरै कै, भवेससों, सुरेसहूकी संपदा सुभायसों न लेत रे ॥१६२॥ अरे अनेक देवताओंकी उपासनामें लगा रहकर मशान क्यों जगाता है ? अरे मूर्ख ! इस प्रकार तू अपनी प्रतिष्ठा खोकर आग्रहपूर्वक प्रेत क्यों बनता है ? अरे अज्ञानी ! तू करोड़ों उपाय करके दौड़-दौड़कर क्यों मरता है ? तथा देश-देशके राजाओंसे क्यों याचना करता फिरता है ? तुलसीदासजी कहते हैं-बिना विश्वासके ही तू प्रयागमें देहत्याग करता है। तथा धनके लिये