भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 209

कवितावली २०६ भेष नौ भिखारिको भयंकररूप संकर दयाल दीनबंधु दानि दारिददहनु है ॥१६०॥ जो माँगनेवालोंको सम्पत्तिसहित श्रीसम्पन्न अथवा लक्ष्मीजीका भवन अर्थात् वैकुण्ठ, भवन देते हैं; किन्तु जिनके घरमें केवल विभूति (भस्म) और भाँग है और चढ़नेके लिये जिनके बैलकी सवारी है, जिनका नाम तो 'वामदेव' है, किन्तु जो सर्वदा सबको दाहिने (अनुकूल) रहते हैं, सदा असंग (निर्लेपता का ठाट रहनेपर भी जिनके अर्धाङ्गमें पार्वतीजी रहती हैं तथा जो कामदेवका मथन करनेवाले हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—उन श्रीमहादेवजीका प्रभाव मात्र (भक्ति) से ही सुलभ है, नहीं तो वेद-शास्त्रके लिये भी उसका जानना अत्यन्त कठिन है। उनका वेष तो भिक्षुकोंका-सा है तथा रूप भी बड़ा भयानक है, किन्तु वे शङ्कर (कल्याण करनेवाले), दीनबन्धु, दयामय, दानिशिरोमणि तथा दारिद्र्यका नाश करनेवाले हैं। चाहै न अनंग-अरि एकौ अंग मागनेको देवोई पै जानिये, सुभावसिद्ध बानि सो। वारि बूंद चारि त्रिपुरारिपर डारिये तौं देत फल चारि, लेत सेवा सांची मानि सो॥ तुलसी भरोसो न भवेस भोरानाथको तौ कोटिक कलेस करौ, मरौ छार छानि सो। दारिद दमन दुख-दोष दाह दावानल दुनी न दयाल दूजो दानि सूलपानि-सो ॥१६१॥ मदनमथन भगवान् शङ्कर माँगनेवालेसे [षोडशोपचारमेंसे]