कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७५ उत्तरकाण्ड
लोयन बिसाल लाल, सोहैं बालचंद्र भाल कंठ कालकूट, ब्याल-भूषन धरत हैं ॥ सुंदर दिगंबर, बिभूति गात, माँग खात, रूरै सृंगी पूरें काल-कंटक हरत हैं । देत न अघात रीझि, जात पात आकहीकें भोलानाथ जोगी जब औढर ढरत हैं ॥१५९॥
उनका जटाजूट पिंगलवर्ण है, मस्तकपर परमपवित्र गङ्गा- जल सुशोभित है । तथा उनके नेत्रस्थित अग्निकी ज्योति उनकी भौंहोंपर दमकती है । उनके नेत्र विशाल और अरुणवर्ण हैं, ललाटपर द्वितीयाका चन्द्र शोभायमान है, गलेमें कालकूट विष है, तथा वे सर्पोंके आभूषण धारण किये हुए हैं । उनका अति सुन्दर दिगम्बर वेष है और वे शरीरमें भस्म रमाये रहते हैं, भाँग खाते हैं तथा सींगका मनोहर शब्द करके कालरूपी कण्टकको निवृत्त कर देते हैं । जिस समय वे भोलानाथ योगी बेतरह प्रसन्न होते हैं उस समय वे देते-देते अघाते नहीं और स्वयं आकके पत्तोंसे ही रीझ जाते हैं ।
देत संपदासमेत श्रीनिकेत जाचकनि, भवन बिभूति-भाँग, वृषभ बहनु है । नाम बामदेव दाहिनो सदा असंग रंग अर्द्ध अंग अंगना, अनंगको महनु है ॥ तुलसी महेसको प्रभाव भावहीँ सुगम निगम-अगमहूको जानिबो गहनु है ।