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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

कवितावली २२४ तुलसी सभीतपाल सुमिरैं कृपाल राम समय सुकरुना सराहि सनकार दी ॥१८३॥ आश्रम और वर्ग कलिके प्रभावसे विकलङ्ग हो गये और सबने अपनी-अपनी मर्यादाको भारस्वरूप समझकर त्याग दिया। शिवजीका कोप तो महामारीसे ही प्रकट है, स्वामीके कुपित होनेके कारण ही संसारका दारिद्र्य दिनों-दिन बढ़ता जाता है। स्त्री-पुरुष सब आर्त होकर पुकारते हैं, किन्तु उनकी पुकार कोई नहीं सुनता। [मालूम होता है] किन्हीं देवताओंने मिलकर मूठ चला दी थी (अभिचारका प्रयोग किया था); किन्तु भयभीतोंकी रक्षा करनेवाले कृपालु श्रीरामको स्मरण करते ही उन्होंने अपनी करुणाकी प्रशंसा करके उसे समयपर अपना काम करनेका संकेत कर दिया [जिससे वह बीमारी बात-की-बातमें चली गयी]। समाप्त कुछ प्रतियोंमें १७७ छन्द ही मिलते हैं। काशी-नागरीप्रचारिणी सभाकी प्रतिमें १८३ छन्द हैं। अतः १८३ छन्द रखे गये हैं।

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